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Friday, February 28, 2014

ग़ज़ल - १३

ग़ज़ल - १३

 
बात झूठी भी खरी होने लगी।
वो कहावत अब सही होने लगी।।


रास्ते ये प्यार के, मंज़िल हसीं,
उनसे मुझको दिल्लगी होने लगी।

 
ख्वाहिशें उस चाँद की बढ़ने लगीं,
तू-तू मैं-मैं रोज़ ही होने लगी।
 
रात सारी गुफ़तगू में थी मगर,
सुब्ह चुप-चुप थी, दुखी होने लगी।

 
जगमगाये, झिलमिलाये ख़ाब जो,
चाहतें उनकी बड़ी होने लगी।

 
ज़ख्म खुद ही भर गये, देखा उसे,
आज हमको फिर ख़ुशी होने लगी।

 
है चरागों के बगल में रौशनी,
दूर सारी बेबसी होने लगी।

 
वो खुदा थे, रहनुमां भी, चल दिये,
उनके जाने से कमी होने लगी।


इश्क़ को तुम रोग "रत्ती" मान लो,
एक पल में आशिक़ी होने लगी।

Thursday, May 9, 2013

ग़ज़ल - १०

ग़ज़ल - १० 

लम्हे के गिरेबां से इक सांस चुरानी है 
इस वक़्त के चंगुल से जां सबको बचानी है 

कोई किस का दामन पकडे कब तक हर दिन 
हर दिल बिखरा टूटा सबको परेशानी है 

उनवान बदल जायेगा जीवन का तेरा 
परवाज़ सुबह की अच्छी शाम दिवानी है 

दो ख़ाब मिटे दस ने दी दस्तक हम को फिर 
कैसा रिश्ता इनका कितनी मनमानी है 

जुमले अब अंगारे की शक्ल में बरसे हैं 
जलते-बुझते दिल आँखों से गिरे पानी है 

नस-नस कहती करे-दुश्वार है शफ़क़त 
मोहब्बत में  हर शै अब रोज़ लुटानी है 

अब रंग लहू का कैसे लाल से नीला हो 
ना मुमकिन को मुमकिन शै कह के बतानी है 

"रत्ती" न हिमायत कर ना खुशफ़हमी ले आ 
हालत दिल की नाज़ुक राह भी तुफानी है 

शब्दार्थ 
करे-दुश्वार - कठिन काम 
शफ़क़त - स्नेह 

Saturday, October 1, 2011

ग़ज़ल - ४



ग़ज़ल - ४ 

पेच-ओ-ख़म  ना  ख़लिश  ना  ख़ार   होना   चाहिये  
बात है बस एक दिल में प्यार  होना  चाहिये

चांद ताकता आसमां से छुप के तेरी हर अदा,
है  निशानी इश्क़  की  इज़हार होना चाहिये

एक तरफा  प्यार बढती बेक़रारी क्या  देगी,
बारहा अब चाह बस गुफ़्तार  होना  चाहिये

चोट मारी है जिगर पे हमसफर ने ख़ाब  में,
रु - ब -रु नज़दीक से ही वार होना चाहिये 

जब  किसी  साये ने  छेड़ा  झट  से  बोली  रूह  भी,
फासला   तहज़ीब   का    सरकार   होना  चाहिये

इश्क़ सबको मज़ा दे गर प्यार सच्चा है किया,
प्यार में बस प्यार "रत्ती" प्यार होना चाहिये  

शब्दार्थ 
पेच-ओ-ख़म =घुमाव और मोड़,  ख़ार = कांटा
रु-ब-रु = सामने, बारहा = बार-बार, गुफ़्तार = बातचीत

Friday, September 2, 2011

ग़ज़ल - ३

ग़ज़ल - ३

कीमत बहुत है एक सही कहे बयान की,
ये भी ज़रूर न फिसलन हो ज़बान की 

अम्बर से आये हैं सब महरूम टूटे दिल,
बेचैन, बिखरे, नाखुश, आहट तुफान  की 
 
सीरत अजीब शक्ल अजीबो ग़रीब है,
कैसे ज़हीन बात करे खानदान की 
 
शम्सो-क़मर नहीं चलते साथ ना कभी,
दीदार चाहे बात न कर इस जहान की
 
सर पर कफ़न लिये बढ़ता है जवान वो,
परवाह है नहीं दुश्मन की न जान की
 
तस्कीन दे रहे सब "रत्ती" ज़माने में,
बचे कुछ तो सूखे शजर दौलत किसान की

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