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Thursday, December 18, 2014

ग़ज़ल - १४

ग़ज़ल - १४
याद उसकी बड़ी सुहानी थी।
बस मेरे पास इक निशानी थी।।
रात भर जाग के गिने तारे,
सुबह तक साँस भी बचानी थी।
प्यार की मार भी अनोखी है,
और हमको किमत चुकानी थी।
बंद देखा हरेक दरवाज़ा,
उनको हमसे नज़र चुरानी थी।
हो मिलनसार तो बहुत अच्छा,
फिर मुहब्बत फकत निभानी थी।
जल गयी फिर बुझी अखियाँ जो,
प्यास दिन रात ही बुझानी थी।
साफ "रत्ती" नहीं शीशा दिल का,
इल्म की आग ही जलनी थी।
 

Tuesday, October 1, 2013

ग़ज़ल - १२

 
 ग़ज़ल - १२


कभी मशहूर था इक नाम था गुमनाम से पहले .
जिसे सर    पे बिठाते पूछते नाकाम से पहले



क़सक रह रह के तड़पती रही इस जान को दिन भर,
न आया संगदिल माही मेरा वो शाम से पहले



जली गहरी बुझी यादों से शिकवा न गिला कोई,
गुज़र ही जायेगी ये ज़िन्दगी फ़रज़ाम* से पहले



ख़ता जो हो गयी तो हो गयी बस में नहीं क्या ये ?
ज़रा तुम सोच लेते इक दफ़ा अंजाम से पहले



न मयखाना रहा ना महकती यादें सनम तेरी,
ज़रा लुत्फ़ मिलेगा हमको पूछो जाम से पहले



खुली पलकों तले ढूंढे ज़रा सी छाँव जब "रत्ती"
सितम ढाये ज़माने ने मगर हर काम से पहले



फ़रज़ाम = नतीजा, परिणाम, अंत

1222/1222/1222/1222

Tuesday, September 17, 2013

ग़ज़ल - ११

ग़ज़ल - ११
बदनाम करते लोग कहें सच्चे यार हैं।
हम आपके लिए करते जां निसार हैं।।
दामन लगे हैं दाग धुलेंगे न अश्क़ से,
दौलत सवाब की कम है इन्तिशार हैं।
अरमान पालना दुश्वारी से कम नहीं,
फिर भी तलब नशा इतना हम शिकार हैं।
वो खौफ़ दर्द थामे खड़े तकते चार सू,
ऐसे हबीब ज़ख्म देंगे नागवार हैं।
ये वलवले बड़ी उम्मीदों भरे लगे,
हलके वरक महज़ लगते इश्तहार हैं।
शीशा कहे रहम करो तन्हा मुझे रखो,
फितरत है टूटना ग़म भी बेशुमार हैं।
चिंगारियां छुपी थी दबे पाँव आ गयी,
जलता रहा बदन हवाएं साज़गार हैं।
मुडती गली सुहावने मंज़र दिखायेगी,
"रत्ती" किसे खबर तपते आबशार हैं।
शब्दार्थ
सवाब = पुण्य, इन्तिशार = परेशान,
चार सू = चारों तरफ, हबीब = मित्र,
नागवार = अप्रिय, वलवले = उमंग,
वरक = पन्ने, साज़गार = अनुकूल,
आबशार = झरना

Saturday, September 1, 2012

ग़ज़ल - ८

ग़ज़ल - ८

रंग महफ़िल में जम के जमाया करो
लुत्फ़ हर लम्हे का सब उठाया करो
 
पाक दामन नहीं साफ दिल भी नहीं
तोहमत तुम न उन पे लगाया करो
 
चीज़ मिलती है बाज़ार में हर जगह
मुफ्त पर आँख तुम ना गढ़ाया करो
 
बरहना खेल गन्दा सियासत भरा
ना खेलो तुम कभी ना सिखाया करो
 
वो शजर क्या खिलेंगे बहारों में अब
उन पे आरा न साहिब चलाया करो
 
मंजिलें हैं वहीँ पास आती नहीं
कुछ कदम आप नज़दीक जाया करो
 
खा चुके हैं कई ठोकरें अब तलक
मौत का डर हमें ना दिखाया करो
 
बहरे ग़म ना सुनें अब किसी बात को
कश ख़ुशी का ले उनको उड़ाया करो

ज़िन्दगी बेवफ़ा भी गुज़र जायेगी
हौसला तुम न "रत्ती" गिराया करो

Monday, April 2, 2012

ग़ज़ल - ७

ग़ज़ल - ७

ज़माने भर के हसीं चेहरे ही ज़हन में आये
नये-नये ख़ाब और रगबत ज़रा सी हरकत चुभन में आये

शऊर सीखा है इश्क़ का आपसे हशर भी कमाल होगा
वफूर-ए-इश्क़ साँस में रोम-रोम में तन-बदन में आये

जवां हसीं ज़िन्दगी की इब्तिदा तो हुई मगर फिर
दहर के फितने खिले दिलों पे सितम को ढाने चमन में आये

सुलग गये दिल न जाने किस बात पर हुआ रंज आज उनको
जहां पे बिखरे महक ख़ुशी झूमें आप उस अंजुमन में आये

नवर्द-ए-इश्क़ जीत के तुमको साफ राहें नहीं मिलेंगी
सुकून की रंग-ओ-बू फैले नहिफ उल्फत शेवन में आये

गिरा न देना मुझे नज़र से बहोत छानी है खाक़ मौला
दमे-आख़िर बस लबों पे हो नाम हरपल तेरा ज़हन में आये

रवायतों का किया धरा है बशर न सर को उठा सकेगा
गुमान मग़रिब गुमान मशरिक़ ये ज़ुल्म "रत्ती" अमन में आये

१२१२२, १२१२२, १२१२२, १२१२२
शब्दार्थ
रगबत - रूचि, शऊर - योग्यता, तरीका, वफूर - ज़्यादा,  इब्तिदा - शुरुवात
दहर - दुनियां, फितने - उपद्रव, कठिनाइयाँ, अंजुमन - महफ़िल, सभा
नवर्द-ए-इश्क़ - प्रेम की जंग,  रंग-ओ-बू - रंग और सुगंध, नहिफ - कोमल, मृदु,
शेवन - आचरण, व्यवहार, रवायत - रिवाज़, बशर - आदमी,  मग़रिब  - पश्चिम, मशरिक़ - पूरब
      

Wednesday, March 28, 2012

ग़ज़ल - ६

ग़ज़ल - ६

सुब्ह भी खुल के कभी हसती नहीं तो क्या हुआ I
रूठ जाये शाम ये बोलती नहीं तो क्या हुआ II १ II

गाहे-गाहे वो मेरी दहलीज़ पर आने लगे I
शोख नज़रें इस तरफ तकती नहीं तो क्या हुआ II २ II

क़ुर्ब है अहसास है इस दिल में बसते आप हैं I
काकुलों में उंगली फेरी नहीं तो क्या हुआ II ३ II

जोश में तो होश भी जाता रहा सरकार का I
इश्क़ में मन की कभी चलती नहीं तो क्या हुआ II ४ II

बिखरे हैं अल्फाज़ शायर यूं ही हम तो बन गये I
सीख "रत्ती" शायरी आती नहीं तो क्या हुआ II ५ II
२१२२, २१२२, २१२२, २१२

Wednesday, February 8, 2012

ग़ज़ल - ५

ग़ज़ल - ५



बोले न मुंह से लिखे माही किताब में

पहली दफा लिखा ख़त है मुझे जवाब में



जगमग हुआ है दिल कितने दिन के वास्ते

महका खिला ये गुल उजड़े से सराब में



वो ऐब को हुनर कहते हैं सही नहीं

मय लुत्फ़ दे मगर खुमारी शबाब में



नाशाद दिल किसी दिन टूटे यक़ीन हैं

तदबीर ढून्ढ लो इस पल तुम अज़ाब में



हैवान, तिशन-ए-खूं सियासत पसंद जो

फिर मुल्क लूटेंगे सब इस इन्तखाब में



रहमो-करम दुआ करना भूल सा गये

तहज़ीब की झलक मिले "रत्ती" अब ख़ाब में



२२१ / २१२१ / १२२१ / २१२

शब्दार्थ

शब्दार्थ


सराब = रेगिस्तान,  खुमारी = नशा,  शबाब = जवानी,

नाशाद = अप्रसन्न,  तदबीर = उपाय,  अज़ाब = परेशानी,

तिशन-ए-खूं = खून का प्यासा,  इन्तखाब = चुनाव,  तहज़ीब = संस्कार

Saturday, February 26, 2011

ग़ज़ल - १

हर दिन ना होता जश्न भरा ना लम्हा लगता है,
है भीड़ यहाँ फिर भी हर शख्स तनहा लगता है 

दर्दे-दिल क्या होता है पत्थर दिल क्या जानें,
हर बार मुझे प्यार फक़त धोखा लगता है

मैं कू-ए-यार गया तो था नज़राना देने,
आँख उठा के ना देखा वो रूठा लगता है

वो चाँद बड़ा शातिर है भोला ना मानो रे,
हँसता है डसता है फिर भी अच्छा लगता है

हर सिम्त यहाँ महफ़िल में चर्चे होते रहते
"रत्ती" हो कोई बात नयी मजमा लगता है

Thursday, January 27, 2011

भरोसा

भरोसा

प्यार कितना है भरोसा करें किसी पर कैसे हम,
कौन जाने राज़ गहरे हर नफ़स मुश्किल में है

रात की ये कालिमा डसे फिर सहर कटे हमें,
आदमी जाये किधर खौफ़ हर मंज़िल में है

आदमीयत खो चुके हैं बारहा दिन-रात हम,
मुज़्तरिब यह रूह भी काँटों घिरी हाइल में है

क्या मदावा प्यार का  हौसला टूटा हुआ,
है कहाँ लज्ज़त बची अब फर्द तो गाफिल  में है

ये बड़ा रूतबा तुम्हारा और रंगो-बू कहे,
तुमसे ज़्यादा है बहुत इज़्ज़त अपढ़ साइल में है 

हम फकीरों जैसे "रत्ती" घूम-भटके हर-गली,
प्यार देता कौन क्या शांती किसी महफ़िल में है

शब्दार्थ
मुज़्तरिब = बेचैन, हाइल = बाधा, मदावा = उपचार
लज्ज़त = ख़ुशी, फर्द = आदमी, गाफिल = बेख़बर
रंगो-बू = रंग और सुगन्ध, साइल = भिखारी