Monday, April 2, 2012

ग़ज़ल - ७

ग़ज़ल - ७

ज़माने भर के हसीं चेहरे ही ज़हन में आये
नये-नये ख़ाब और रगबत ज़रा सी हरकत चुभन में आये

शऊर सीखा है इश्क़ का आपसे हशर भी कमाल होगा
वफूर-ए-इश्क़ साँस में रोम-रोम में तन-बदन में आये

जवां हसीं ज़िन्दगी की इब्तिदा तो हुई मगर फिर
दहर के फितने खिले दिलों पे सितम को ढाने चमन में आये

सुलग गये दिल न जाने किस बात पर हुआ रंज आज उनको
जहां पे बिखरे महक ख़ुशी झूमें आप उस अंजुमन में आये

नवर्द-ए-इश्क़ जीत के तुमको साफ राहें नहीं मिलेंगी
सुकून की रंग-ओ-बू फैले नहिफ उल्फत शेवन में आये

गिरा न देना मुझे नज़र से बहोत छानी है खाक़ मौला
दमे-आख़िर बस लबों पे हो नाम हरपल तेरा ज़हन में आये

रवायतों का किया धरा है बशर न सर को उठा सकेगा
गुमान मग़रिब गुमान मशरिक़ ये ज़ुल्म "रत्ती" अमन में आये

१२१२२, १२१२२, १२१२२, १२१२२
शब्दार्थ
रगबत - रूचि, शऊर - योग्यता, तरीका, वफूर - ज़्यादा,  इब्तिदा - शुरुवात
दहर - दुनियां, फितने - उपद्रव, कठिनाइयाँ, अंजुमन - महफ़िल, सभा
नवर्द-ए-इश्क़ - प्रेम की जंग,  रंग-ओ-बू - रंग और सुगंध, नहिफ - कोमल, मृदु,
शेवन - आचरण, व्यवहार, रवायत - रिवाज़, बशर - आदमी,  मग़रिब  - पश्चिम, मशरिक़ - पूरब
      

Wednesday, March 28, 2012

ग़ज़ल - ६

ग़ज़ल - ६

सुब्ह भी खुल के कभी हसती नहीं तो क्या हुआ I
रूठ जाये शाम ये बोलती नहीं तो क्या हुआ II १ II

गाहे-गाहे वो मेरी दहलीज़ पर आने लगे I
शोख नज़रें इस तरफ तकती नहीं तो क्या हुआ II २ II

क़ुर्ब है अहसास है इस दिल में बसते आप हैं I
काकुलों में उंगली फेरी नहीं तो क्या हुआ II ३ II

जोश में तो होश भी जाता रहा सरकार का I
इश्क़ में मन की कभी चलती नहीं तो क्या हुआ II ४ II

बिखरे हैं अल्फाज़ शायर यूं ही हम तो बन गये I
सीख "रत्ती" शायरी आती नहीं तो क्या हुआ II ५ II
२१२२, २१२२, २१२२, २१२

Wednesday, March 7, 2012

"होली का हुडदंग"


प्रिय मित्रो, आप सबको होली की शुभ कामनाएं, 
होली के इस अवसर पर एक छोटा गीत पेश कर रहा हूँ - सुरिन्दर रत्ती    

"होली का हुडदंग"
 
राधा भई बावरी, श्याम भये मस्ताने
भिगोते हैं अंगिया, कोई बुरा न माने
वो होरी क्या जिसमें, न हो कहीं बरजोरी
दुबक के जो बैठे हैं, लगे उनको नहलाने
 
इक हाथ रंग का थाल, दूजे बड़ी पिचकारी
सखियों संग राधा जी, लग रही हैं प्यारी
वृन्दावन ही नहीं, धूम मची बरसाने
राधा भई बावरी, श्याम भये मस्ताने.....
 
सोरह सिंगार करके, मुख सबके चमके
विभोर हैं नर-नारी, रंगों को मल-मल के      
अदभुत है ये लीला, कोई माने या न माने 
राधा भई बावरी, श्याम भये मस्ताने.....
 
रंग-बिरंगे रंगों की, सुन्दर सुन्दर छटा
सुहानी बेला होरी की, छाई मोहनी घटा
ग्वाल-बाल झूम के, गाते मधुर गाने
राधा भई बावरी, श्याम भये मस्ताने.....
 
खूब खाए जा रहे, भांग की पकौड़ीयां
हलुवा, पूड़ी, रसमलाई, स्वाद भरी कचौड़ियाँ
सारे ग्रामवासी, भर पेट लगे खाने
राधा भई बावरी, श्याम भये मस्ताने.....
 
भरो रोम-रोम में, प्यार श्रद्धा युक्त रंग
उन्माद हो भक्ति का, ब्रम्हांड नायक भी हो दंग
"रत्ती" ऐसी होरी चाहूँ , मिलन के नित हों बहाने
राधा भई बावरी, श्याम भये मस्ताने..... 

Wednesday, February 8, 2012

ग़ज़ल - ५

ग़ज़ल - ५



बोले न मुंह से लिखे माही किताब में

पहली दफा लिखा ख़त है मुझे जवाब में



जगमग हुआ है दिल कितने दिन के वास्ते

महका खिला ये गुल उजड़े से सराब में



वो ऐब को हुनर कहते हैं सही नहीं

मय लुत्फ़ दे मगर खुमारी शबाब में



नाशाद दिल किसी दिन टूटे यक़ीन हैं

तदबीर ढून्ढ लो इस पल तुम अज़ाब में



हैवान, तिशन-ए-खूं सियासत पसंद जो

फिर मुल्क लूटेंगे सब इस इन्तखाब में



रहमो-करम दुआ करना भूल सा गये

तहज़ीब की झलक मिले "रत्ती" अब ख़ाब में



२२१ / २१२१ / १२२१ / २१२

शब्दार्थ

शब्दार्थ


सराब = रेगिस्तान,  खुमारी = नशा,  शबाब = जवानी,

नाशाद = अप्रसन्न,  तदबीर = उपाय,  अज़ाब = परेशानी,

तिशन-ए-खूं = खून का प्यासा,  इन्तखाब = चुनाव,  तहज़ीब = संस्कार

Monday, December 12, 2011

उम्मीद (आशा)


दोस्तों एक आज़ाद नज़्म पेश कर रहा हूँ उम्मीद करता हूँ आपको पसंद आयेगी - सुरिन्दर रत्ती - मुंबई


उम्मीद (आशा)




उम्मीद पे दुनियां कायम

कयास लगाये, नज़रें टिकाये,

कभी चहके, कभी चिल्लाये

जुमलों को सजाये, जी को बहलाये

खुबसूरत बीमारी, सबकी तरफदारी

फिर आ धमकी बेकसी और बेक़रारी

थी तलाश नजूमी की, जो पढ़ता कसीदे

बताता लुभावने हसीं किस्से

देख रहा हूँ जिस्मो-जां के दो अलग हिस्से

जिगर तक्सीम कई टुकड़ों में,

फिर कहीं गूंजती भटकती सदा,

उसकी आहट, सुगबुगाहट, सनसनाहट

और इकलौती रूह जुम्बिश में

देखे दिन में तारे

खौफ़ से निकली चिंगारियां,

खाक़ में न मिले सदियों की यारियां

खुदा जानें क्या टूटा अंदर-बाहर

एक उम्मीद के सहारे निकले

किनारे-किनारे

बचा फक़त असर दुआओं का

दिलासा रहनुमाओं का

पीरों की सोहबत, उनका करम

यही उम्मीदों को बांधे रक्खे

अब तलक मिले थे चार सू धक्के

कोई कहता आबाद है, कोई कहे बरबाद है

मैं अन्जान हूँ

ख़ैर, उम्मीद का दामन पकड़ा है,

उसी के पहलू में रहना पसंद है.....

Saturday, October 1, 2011

ग़ज़ल - ४



ग़ज़ल - ४ 

पेच-ओ-ख़म  ना  ख़लिश  ना  ख़ार   होना   चाहिये  
बात है बस एक दिल में प्यार  होना  चाहिये

चांद ताकता आसमां से छुप के तेरी हर अदा,
है  निशानी इश्क़  की  इज़हार होना चाहिये

एक तरफा  प्यार बढती बेक़रारी क्या  देगी,
बारहा अब चाह बस गुफ़्तार  होना  चाहिये

चोट मारी है जिगर पे हमसफर ने ख़ाब  में,
रु - ब -रु नज़दीक से ही वार होना चाहिये 

जब  किसी  साये ने  छेड़ा  झट  से  बोली  रूह  भी,
फासला   तहज़ीब   का    सरकार   होना  चाहिये

इश्क़ सबको मज़ा दे गर प्यार सच्चा है किया,
प्यार में बस प्यार "रत्ती" प्यार होना चाहिये  

शब्दार्थ 
पेच-ओ-ख़म =घुमाव और मोड़,  ख़ार = कांटा
रु-ब-रु = सामने, बारहा = बार-बार, गुफ़्तार = बातचीत

Sunday, September 18, 2011

इल्म (Adult Education Programme)












इल्म
(Adult Education Programme)

कुछ दरीचे बंद थे, कैसे आये महकती सबा,
उम्र के इस दौर का, जोश बहोत अच्छा लगा

बढ गए उनके क़दम, कुछ सीखने की चाह में,
इल्म होगा कितना हासिल, वक़्त देगा इसका पता

कारवाँ गुज़र गया, ज़ोफ जिस्मो-जान में,
दमे आखिर कलम से, हो रही अब इब्तिदा

बेशुमार कलियाँ चमन में, तड़प रहीं, बेनूर भी,
ख़्वार होती जवानियाँ, पूछती सबसे जा-ब-जा

चंद सिक्कों की खनक में, हर इल्म कहीं खो गया,
अलिफ, बे ग़रीब न जाने, जीना उनका इक सज़ा

हों मुसलसल कोशिशें, गर तरक्क़ी के वास्ते,
क्या मजाल हुनर की, सर झुकाए रहे पास खड़ा

मोहताज, नाचार बशर, सोती रही हुकूमतें,
"रत्ती" विरासत में मिला, तंगहाल टूटा मदरसा

Tuesday, September 13, 2011

गीत - १

गीत - १  


समंदर यादों का भरा हुआ

हाय क्या हुआ ये क्या हुआ

क्या कुछ खो गया है

इक रोग हो गया है

खुबसूरत चेहरा डरा हुआ



जवां खाबों ने ली अंगडाइयां

लम्बी हैं बैरी तन्हाइयां

वक़्त भी है ठहरा हुआ

हाय क्या हुआ ये क्या हुआ .....



दर्द केह रहा ग़मों से अब

जिस्मो जां से जाओगे कब

इंतज़ार में ज़ख्म हरा हुआ

हाय क्या हुआ ये क्या हुआ .....



जाम की तरफ नज़र जाये

पी बहोत पर नशा न आये

मय है के पानी इसमें भरा हुआ

हाय क्या हुआ ये क्या हुआ .....



वस्ले यार की है बेक़रारी

लगी है दिल में चिंगारी

बुझाये ना बुझे बुरा हुआ

हाय क्या हुआ ये क्या हुआ .....

Friday, September 2, 2011

ग़ज़ल - ३

ग़ज़ल - ३

कीमत बहुत है एक सही कहे बयान की,
ये भी ज़रूर न फिसलन हो ज़बान की 

अम्बर से आये हैं सब महरूम टूटे दिल,
बेचैन, बिखरे, नाखुश, आहट तुफान  की 
 
सीरत अजीब शक्ल अजीबो ग़रीब है,
कैसे ज़हीन बात करे खानदान की 
 
शम्सो-क़मर नहीं चलते साथ ना कभी,
दीदार चाहे बात न कर इस जहान की
 
सर पर कफ़न लिये बढ़ता है जवान वो,
परवाह है नहीं दुश्मन की न जान की
 
तस्कीन दे रहे सब "रत्ती" ज़माने में,
बचे कुछ तो सूखे शजर दौलत किसान की

२२१ २१२१ १२२१ २१२ 

Friday, July 22, 2011

फक़त तुझे भुलाया

फक़त तुझे भुलाया 

चुन-चुन के तिनके, यहाँ तलक मैं आया,
उधार की ज़िन्दगी को, किसी तरह बचाया 

लाखों करम हैं मुझपे, उनका हिसाब नहीं हैं,
अगली सुब्ह फिर तेरी, चौखट पे मैं आया     

वादा खिलाफी तो मैं, हर रोज़ ही करता हूँ,
मुस्कूरा के नाचीज़ को, सीने से लगाया 

तू बाहें फैला के, इंतज़ार कर रहा है,
मेरी ही खता है, चेहरा अपना छुपाया

दुनियाँ का तो खौफ, तेरा ज़रा नहीं है,
तेरी हर बात नज़रअंदाज़ करता आया 

तेरे दम से ये आलम, महफूज़ चल रहा है,
ये हमारा ही कुसूर है, काँटों को बिछाया 

तेरे नाम की मय, बरस रही है जहां में,
अमृत छोड़ सबने, ज़हर का जाम उठाया 

कहीं भूले से कभी, सजदा भी करता हूँ,
दिल में बसी है दुनियां, तुझे बसा न पाया 

सारे आसरे सहारे, दम तोड़ रहे हैं, 
बुरे वक़्त में बस, खुदा ही याद आया 

हरेक राबता "रत्ती" ने, खूब है निभाया,
सबको याद रख के, फक़त तुझे भुलाया  

Friday, July 1, 2011

ग़ज़ल

ग़ज़ल - २ 

ख़ुशी के बाद ग़म का चुपके से आना भी होता था,
खुशियाँ चार दिन  फिर रूठ के जाना भी होता था 

अज़ल से तो  ग़ज़ल  का  साथ  भाया रास  आया,
जवानी है  दीवानी अंदाज़  मनमाना  भी होता था 

जिसे देखो सदाक़त  की क़सम  खाई  दावा जैसे,
असर  कैसे  पड़े  झूठों  से  याराना  भी  होता  था 

अचानक क्या हुआ बादल फलक से टूट के बिखरे,
कभी नज़दीक सूरज  का गुज़र जाना  भी होता था 

आग लगा  के "रत्ती"  खेल  खेला ना करो  लोगों,
गिला, शिकवा, कसीदे पढ़ के इतराना भी होता था 

Monday, June 13, 2011

रिश्ते

"रिश्ते"


रिश्ते इस धरा पर जन्म लेते ही

ख़ुद-बखुद बन जाते हैं

बीज अंकुरित हुआ, तना, शाखाएं,

अपने आप बढने लगी

पर ये भी सच है

सम्बन्ध सदा एक से नहीं रहते

गिरगिट की तरह रंग बदल ही जाता है

बेकार की बातें दरारों की जननी हैं

उलझनों के तूफ़ान उठते हैं

वातावरण में चिंगारियां उड़ती

दिखाई देती हैं

रातों की नींद, सुबह का चैन

खुले गगन में कहीं खो जाता है

एक प्यार भरी नज़र

दो मीठे बोल

थोड़ी सी चुटकी भर मुस्कान

का स्वादिष्ट तड़का

जीवन में रिश्तों को

संवार सकता हैं

दिन में खुशियाँ, शाम को रंगीन

बना सकता है

और यह भी याद रहे भ्रम के लिए

तिनके जितनी भी जगह न मन में रहे

और हजारों रिश्तों में सच्चा रिश्ता

नीली छतरी वाले से,

परवरदिगार से, वाहेगुरु से, इश्वर से, इसा से

ये भी सच है

संसार का रिश्ता

आँख मूंदते ही

टूट कर बिखर जाता है .....

Tuesday, May 10, 2011

बस में नहीं

बस में नहीं


ग़मों के ज़लज़ले दिल में समेट लूँ बस में नहीं,
सर्द हवायें कड़कती धूप किसी के बस में नहीं

चाहतों की दुनियाँ में बड़ी से बड़ी चाहत मिली,
ज़मीं के बाशिंदे के  पैर फलक़ पे बस में नहीं

वो हबीब रुठा है मिन्नतों से मना लूंगा लेकिन,
गौहर-ओ-ज़र की चाहत उसे मेरे बस में नहीं

आबरु की बोली लगानें वाले आज जश्न मना रहे,
तोहमतों की  बौछार से संभल जाऊँ बस में नहीं

किसी अन्जान के मानिन्द इज़्ज़त तराज़ू में तौले,
 फ़रेब का झूका पलड़ा रोक  लूँ मेरे बस में नहीं

मयख़ाना ही अक्सर  नज़र आता है गर्दिशों  में,
दो मीठे बोल सुरीले नगमें सुनूँ मेरे बस में नहीं

बिखरे दिल के टुकड़ों को ढून्ढता हूँ दिन-रात,
जो बिछडे़ “रत्ती“ उनका विसाल मेरे बस में नहीं

Wednesday, April 20, 2011

प्यारी है

प्यारी है


ज़िन्दगी तू इक बोझ कितनी भारी है,
लेकिन फिर भी हमको जान से प्यारी है

सारे लुत्फ मिलते हैं इस रंगीन ज़माने में,
हर शै में क़शिश और तलाबगारी है

रक्स करना पड़ा तो करेंगें हम रोज़, 
आखरी सांस तक लड़नें की तैयारी है

चाहे कई कांटे बिछे हैं हमारी राहों में,
पहले ही दिन से इनसे जंग जारी है

ज़िंदगी को मेहनत, लहू से सींचा है "रत्ती"
इसे महफूज़ रखना सबकी जिम्मेदारी है

Saturday, February 26, 2011

ग़ज़ल - १

हर दिन ना होता जश्न भरा ना लम्हा लगता है,
है भीड़ यहाँ फिर भी हर शख्स तनहा लगता है 

दर्दे-दिल क्या होता है पत्थर दिल क्या जानें,
हर बार मुझे प्यार फक़त धोखा लगता है

मैं कू-ए-यार गया तो था नज़राना देने,
आँख उठा के ना देखा वो रूठा लगता है

वो चाँद बड़ा शातिर है भोला ना मानो रे,
हँसता है डसता है फिर भी अच्छा लगता है

हर सिम्त यहाँ महफ़िल में चर्चे होते रहते
"रत्ती" हो कोई बात नयी मजमा लगता है

Thursday, January 27, 2011

भरोसा

भरोसा

प्यार कितना है भरोसा करें किसी पर कैसे हम,
कौन जाने राज़ गहरे हर नफ़स मुश्किल में है

रात की ये कालिमा डसे फिर सहर कटे हमें,
आदमी जाये किधर खौफ़ हर मंज़िल में है

आदमीयत खो चुके हैं बारहा दिन-रात हम,
मुज़्तरिब यह रूह भी काँटों घिरी हाइल में है

क्या मदावा प्यार का  हौसला टूटा हुआ,
है कहाँ लज्ज़त बची अब फर्द तो गाफिल  में है

ये बड़ा रूतबा तुम्हारा और रंगो-बू कहे,
तुमसे ज़्यादा है बहुत इज़्ज़त अपढ़ साइल में है 

हम फकीरों जैसे "रत्ती" घूम-भटके हर-गली,
प्यार देता कौन क्या शांती किसी महफ़िल में है

शब्दार्थ
मुज़्तरिब = बेचैन, हाइल = बाधा, मदावा = उपचार
लज्ज़त = ख़ुशी, फर्द = आदमी, गाफिल = बेख़बर
रंगो-बू = रंग और सुगन्ध, साइल = भिखारी
    

Wednesday, January 26, 2011

दुःख भरी कहानी

दुःख भरी कहानी - गीत १

मंज़िल कोई आसां न मिलती होती है परेशानी
देश तुम्हारा मांग रहा है दे दो क़ुर्बानी

आज महफूज़ नहीं है देश की कोई सीमा
सरहद पे रहनेवालों का मुश्किल है जीना
चप्पे-चप्पे की रक्षा सेना करे निगरानी
देश तुम्हारा मांग रहा है दे दो क़ुर्बानी

हर कोने में गद्दार छुपे खतरा उनसे ज़्यादा 
हमको जिंदा दफ़न करने का उनका है इरादा
दुश्मनों को सबक सिखायेंगे हम हिन्दुस्तानी
देश तुम्हारा मांग रहा है दे दो क़ुर्बानी

बेगुनाहों और  मासूमों का लहू बहानेवाले
देशद्रोही है भारत के मनसूबे उनके काले
बुलंद होंसलों में ताक़त है कोई न करे मनमानी
देश तुम्हारा मांग रहा है दे दो क़ुर्बानी

एकता और भाईचारे की बहुत  कमी है
दिलों में नफरत भरी हुई प्यार कहीं नहीं है
यही तो है भारत की दुःख भरी कहानी
देश तुम्हारा मांग रहा है दे दो क़ुर्बानी

Saturday, December 18, 2010

मन

मन


इक पल  यहाँ   दूजे   पल वहां  भागता   है ये  मन,
इसकी गति को  पकड़ने में  लग जाते  कई  जनम 


कोशिशें   लाखों    करनी   पड़ती   हैं   हम   सबको,
मानव  हार   चुका   है    हो    रहा   हमारा   पतन


हम   ही   को इसके  गले  में  डालना  होगा   फंदा,
जिद्द  करो  बंधो  इसे  या  खाओ  कोई  तुम क़सम


गुलामी   करती   है   रोज़   सारी  दुनियाँ   इसकी,
कहने को   ये  दोस्त,  हक़ीक़त है ये हमारा दुश्मन 


मदारी  ने  बन्दर  को   काबू  में   रखा  रस्सी  से,
"रत्ती" तुम  भी  करो  ऐसा  पक्का  मज़बूत जतन 

Saturday, November 6, 2010

"दीपावली"

"दीपावली"


आओ सखियों सब मिल के रंगोली बनाओ री,
अयोध्या नगरी को दुल्हन की तरह सजाओ  री

रामचन्द्र के आगमन पर कोई त्रुटी न रहे,
सुगन्धित पुष्पों की माला उनको पहनाओ री

हर गली को रंग-बिरंगे फूलों से सजाना,
रामचंद्र जब चले यहाँ से पुष्प उन पर बरसाओ री

मिष्ठान, पकवान हर तरह के ध्यान से बनाना,
छप्पन भोग, स्वादिष्ट भोजन का भोग लगाओ री

तन-मन-धन से पूजा, अर्चना का ही हो लक्ष्य,
भजन, मंगल आरती, प्रेम सहित गाओ री

राम प्रसन्न तो सब प्रसन्न, तैतीस करोड़ देवी-देव,
रामपद पूजा में मन को निरंतर लगाओ री

लक्ष्मी जी भी प्रसन्न होती राम के गुणगान से,
चिंतन के दीप अंतर्मन में सदा जलाओ री

जय- जयकार करो उत्साह से, बहुत प्यार से,
ह्रदय से पुकारो राम जी को और रिझाओ री

दीप जलाओ भक्ति के, आस्था और श्रद्धा भरे,
इस नियम को पक्का कर जीवन सफल बनाओ री

Monday, November 1, 2010

शोला रू

शोला रू


फरिश्ते  भी  खुल्द  से  ज़मीं   पर नहीं आते,
भूल के  भी  अपना  पता  नहीं  हमें   बताते

बहरे  जहाँ   बरहम  शोला रू    नज़र  आया,
ऐसी  रवायत  है  यहाँ   अश्कों   को   सजाते

लोग  किसी को  दिल  के   क़रीब  नहीं  लाते,
और    राज़   अपना     कभी     नहीं    बताते

फर्द     बेसाख़्ता     सरसीमगी   को    पालता,
लज़्ज़तफशां   खु़बसूरत   चीज़ों   को   ठुकराते

जाबजा     गुनाहगार     को     आज़ादी     है,
गुनाह   किसी  का   देख   के   नहीं   समझाते

ज़रा सी  भी शफ़क़त  नहीं किसी के  दिल में,
रंज - ओ - मेहन   को   ही   चार  सू  फैलाते

इन्सां  कारदां  है   मगर   गुमां   करता    हैं,
मासूम     फरर्माबरदार     को    बहुत   डराते

तंग-नज़र,   पासदारी   की  बुनियाद पर बैठे,
पसोपेश   में   ख़ुद  को  नहीं लोगों को फसाते

आसेब    हैं    यहाँ     सारे    के   सारे  “रत्ती“,
एक   सदाक़त   को   सात  पर्दों    में  छिपाते

शब्दार्थ 
खुल्द = स्वर्ग, बहरे जहाँ = विश्व सागर, बरहम = नाराज़,
शोला रू = आग जैसे चेहरे, फर्द = आदमी, बेसाख़्ता = अनायास,
सरसीमगी = परेशानी,  लज़्ज़तफशां = मज़ा देने वाली, जाबजा = जगह-जगह
शफ़क़त = स्नेह, रंज-ओ-मेहन = दुख-दर्द, चार सू = चारों तरफ,
कारदां = अनुभवी, गुमां = शक, संशय, फरर्माबरदार = सेवा करनेवाला,
तंग-नज़र = संकीर्ण विचार, पासदारी = पक्षपात, आसेब = भूतप्रेत, सदाक़त = सच्चाई

Friday, October 22, 2010

रू-ब-रू

रू-ब-रू



ज़िन्दगी   महोबत के रू-ब-रू हो गयी,
फिर दोनों  में  इक जंग शुरू हो गयी


अहवाल  बला-ए-इश्क के  नागवार हैं,
न जाने  चर्चा  कैसे कू-ब-कू  हो गयी


वो  जब   नुमाया न  हुई  तो  बेक़रारी,
वस्ले-यार   के  लिये जुस्तजू  हो  गयी


लब-ए-इज़हार की  हरारत कम न थी,
आँखों-ही-आँखों  में  गुफ्तगू  हो  गयी


दोनों  जां हथेली पे लिये निकले “रत्ती“
मर मिटने की होड़ अब आरज़ू हो गयी


शब्दार्थ 
रू-ब-रू = आमने-सामने, अहवाल - विवरण
बला-ए-इश्क = प्रेम का दुख, नागवार = अप्रिय
कू-ब-कू = गली-गली,  नुमाया = प्रकट, वस्ले-यार = प्रियतम से मिलन
जुस्तजू - तलाश, लब-ए-इज़हार = मुंह से कहना, हरारत = उत्साह

Tuesday, October 5, 2010

वो एक है

वो एक है


उसने कहा ख़ुदा मेरा है
तुम्हारा नहीं
मैंने कहा भगवान मेरा है
तुम्हारा नहीं
राम-रहीम को बांट सको तो
बांट लो
वो पतितपावन एक है, एक है, एक है
गद्‌हों को अक्ल होती नहीं
इसमें कुसूर तुम्हारा नहीं

Wednesday, September 15, 2010

बदहाल

बदहाल


ग़मे  हिज्र   की  सूरते   हाल  न   पूछ,
हुआ दिल को कितना मलाल न पूछ

शब   भर  वहाँ  बसी थी  खामोशियाँ,
सहर  हुई  मचा   नया बवाल  न पूछ

आज़ाद   लोगों  के   वास्ते    रोज़  ही,
बुना   बेबसी  ने   एक   जाल  न  पूछ

तू  एक  गुलाम   है   चुप   ही    रहना,
सर  झुका  कर काम   सवाल न पूछ

बिना  खता  के भी  तुझे   सज़ा   देंगे,
तेरे जिस्म पे  न  होंगे  बाल  न   पूछ

सर्द  आहों  में  सुलगे  हैं  जो   अरमां,
दिल  की  तरंगों  का  उबाल  न   पूछ

इब्तिदा   और   इंतिहा   में   फसा  है,
''रत्ती''  दीदा-ए-तर  बदहाल  न  पूछ 

Wednesday, September 8, 2010

ख़ुद को बचाया जाये

ख़ुद को बचाया जाये


चलो आसमां को ज़मीं पे लाया जाये,
चांद-तारों से दिल को बहलाया जाये

रातों की ज़ुल्मतों  में ग़मों को ढून्ढें,
दिन के उजाले में दर्द पाला जाये

कांटों की डोली में बैठ के फिर सोचो,
कैसे ज़ख्मों को ज़्यादा उभारा जाये

लहरों के सीने, जिस्म पे नाचते खेलते,
उनके सोये तुफानों को जगाया जाये

सूरज की गर्मी और उठती लपटें पी के,
पेट की बढती आग को मिटाया जाये

इंसां तो जनम से लापरवाही का हबीब,
उसे सलीके से ही सब सिखाया जाये

''रत्ती'' ये सब मुमकीन नहीं होता कभी,
सदा खतरों से खुद को बचाया जाये

Thursday, August 19, 2010

कामनवेल्थ गेम्स

कामनवेल्थ गेम्स

सब   दे   रहे  हैं  सरकार  को ब्लेम,
भ्रष्टाचार  में लिप्त कामनवेल्थ गेम


कलमाड़ी  का  नाम  है सबसे   उपर,
खूब रौशन  किया है भारत   का नेम


बची इज़्ज़त  को  कर  रहे  तार-तार,
सारा विश्व कह रहा है शेम  शेम शेम


रोज़ी - रोटी   ज़रूरी  है  खेल   नहीं,
क्यों  कर  रहे  देश   को बदनाम लेम


खेलों   से   जनता  को   क्या   फायदा,
''रत्ती''  धोखा  नेताओं   का  देश प्रेम

Saturday, July 31, 2010

संगदिल

संगदिल

संगदिल   बहोत   हैं  रहम   दिलवाले    नहीं  होते,
किसने देखा गोरे तन में मन काले नहीं होते।


चराग़    शहरों   में    चौबीसों    घन्टे   जलते    हैं,
पर   दिन  में   पहले    जैसे   उजाले   नहीं    होते।


मेरे   देश  में   ग़रीब  आज    भी   भूखे  ही सोते,
दो   वक़्त   पेट   भर  खायें    निवाले   नहीं   होते।


रावणराज  का   डंका   बाजे   भारत  में   ''रत्ती''
कुवैत   में    रामराज    वहाँ    ताले   नहीं    होते।


शब्दार्थ
संगदिल = पत्थर दिल

Tuesday, July 6, 2010

आर्थिक हिंसा

आर्थिक हिंसा

आज की इस दौड़ती जिन्दगी में हिंसा की गति बिजली की गति से भी आगे निकल गयी है। आर्थिक हिंसा के रूप गिनाने लगें तो एक पूरा ग्रंथ लिखा जा सकता है। समाज में चहुँ ओर जो हो रहा है दिख रहा है। वह सब बनावटी, मिलावटी और तन, मन, धन सब पर भारी पड रहा है। एक आर्थिक अघोषित युध्द ही है जिसके हम शिकार हो रहे हैं। हर आदमी अपनी स्वार्थ सिध्दी के लिये ज़्यादा मुनाफे के लिये तिकड़में लगा कर लूट रहा है। रातों-रात बिलगेट बनने की तैय्यारी कर रहा है। इस आर्थिक हिंसा के बीज दिनों-दिन मच्छरों की भांति पनप रहे हैं, अपने ही देशवासियों का खून चूस रहे हैं। हमारे संस्कार, सभ्यता और आदर्शों की परिधि सिमट कर रह गयी है।


आईये आर्थिक हिंसा के कुछ चेहरों से आपका परिचय करायें। ये भी सही है इन्हें आपने देखा है, भलिभांति जानते हैं फिर भी आपको इनके निकट दर्शन कराना चाहता हूँ।


सबसे पहले दहेज की प्रथा है, वह चरम पर है। इसमें दो परिवारों के बीच रिश्ते की बुनियाद सिर्फ रूपये-पैसे पर टिकी है, रूपये मांगे और दिये जाते हैं जैसे हम बाज़ार से कोई वस्तू खरीद रहे हैं। हमारे रीति-रिवाज व्यवसायिक रूप ले चुके हैं अतः हम ये कह सकते है शादी के बहाने हम हिंसा कर रहे हैं।


हमारे विद्या मंदिरों, स्कूल, कॉलेजों का व्यवसायिक करण धडल्ले से हो रहा है। बच्चों के दाखिले के समय लाखों रूपये डोनेशन की मांग और उसकी कोई रसीद नहीं दी जाती। तिस पर अभिभावकों को यह कहा जाता है कि आपको यूनिफार्म, पुस्तकें, किताबें स्कूल से ही खरीदने पड़ेंगे । एक मोनोपॉली बना दी गयी है। अभिभावकों को मजबूरन अपने बच्चों के भविष्य की खातिर न चाहते हुए भी डोनेशन देना पडता है। ये अनचाहा आर्थिक नुकसान ही है, हिंसा ही है, इस पर लगाना ज़रूरी है।


हमारे शिक्षकों को ही देखें दिनभर स्कूल में विद्या बांटने का दम भरते हैं और साथ-साथ अभिभावकों को बुला कर बच्चों की कमजोरियां बता कर ट्‌यूशन लगवाने की बात करते हैं। अब प्रश्न ये उठता है फिर वे क्लास में क्या पढ़ाते हैं ? ट्‌यूशन में ऐसा क्या घोल पिलाया जाता है बच्चों को, ट्‌यूशन का अतिरिक्त बोझ एक नया हिंसा का चेहरा दिखा रहा है।


पूरे भारत में पुलिस के कामकाज पर दृष्टि डालें तो बदनामी और रूपये बटोरने के अलावा कुछ नहीं। पीड़ित व्यक्ति को रिपोर्ट लिखाने के समय उनकी मुट्‌ठी गरम करनी पडती है। ये अनावश्यक आर्थिक नुकसान आर्थिक हिंसा के दर्शन कराता है।


सरकारी कार्यालयों के कर्मचारियों की हालत भी ठीक नहीं, वो न समय पर आते हैं और घर जल्दी लौट जाते हैं। रिश्वत लिये बिना कोई काम नहीं करते। जनता को इनकी मांग पूरी करनी पडती है। ये आर्थिक तोटा भी हिंसा की दायरे में है।


हमारी सरकार के चुने हुए प्रतिनिधि चुनाव में दिये वादे के उलट ही हर काम करते हैं। महंगाई को बढाने का श्रेय इनको ही जाता है। जनता जनार्दन की जेब पर जो आर्थिक भार बढ गया है। घर- संसार चलाना बहुत मुश्किल हो गया है। पेट्रोल, डीज़ल से लेकर हर आवश्यक खाने-पीने की चीज का दाम बढ़ाना सरकार की हिंसात्मक कार्यवाही ही है। लोगों को आर्थिक मार पड रही है, ये भी आर्थिक हिंसा का ही रूप है।


ठेले पर सब्जियां, फल और अन्य सामान बेचनेवाले कम तौल कर लोगों को चूना लगा रहे हैं। एक किलो सामान में कभी सौ तो कभी दो सौ ग्राम सामान कम ही आपकी झोली में आता है। ठेलेवाले तराजू का पलडा अपनी मर्जी से झूका देते हैं। ये चोरी भी आर्थिक हिंसा के अंतरगत आती है।


ऑटो-टैक्सीवाले बदनाम है सारे भारत में, ज़्यादा किराया वसूलते हैं यात्रियों से, ये नुकसान हमारा आर्थिक हिंसा ही है।


दूध, तेल, दालें, अनाज, मसाले कोई भी खाने की वस्तु शुद्ध नहीं मिलती उदाहरण के तौर पर दूध में पानी, देसी घी में उबले हुए आलु, आटे में मैदा, तेलों में भी मिलावट केमिकल का प्रयोग होता है। जिसका सीधा असर हमारे स्वास्थय पर पडता है, मजबूरन डॉक्टर्स की शरण में जाना पडता है। ये भी आर्थिक हिंसा हो रही है ग्राहकों पर।


कुछ प्रायवेट नर्सींग होम में डॉक्टर्स द्वारा जबरन सिज़रींग करके बच्चे को बाहर निकलते है। इस ऑपरेशन में माँ को कितनी तकलीफ दर्द होता है ये तो वही जाने, मरीज़ पूरी तरह से डॉक्टर की दया पर जी रहे हैं। पैसा कमाने ये अनोखा तरीका है। ये आर्थिक हिंसा के साथ-साथ हिंसा भी है।


वकीलों और हमारी न्यायपालिका के कामकाज से आम जनता अनभिज्ञ है। आपको महंगी फीस चुकानी पडती है, सलों-साल लग जाते हैं। न्याय मिलेगा के नहीं, इसकी अनिश्चितता बनी रहती है नतीजा पैसे और समय की बर्बादी ये आर्थिक नुकसान भी हिंसा का चेहरा दिखा रहा है।


सडक बननेवाले ठेकेदार, बिल्डर्स सीमेंट, रेत, लोहा निम्न स्तर का प्रयोग करते हैं। अपने आर्थिक लाभ हेतु कच्ची सडकें और मकान बना रहे हैं। ये भी हिंसा कर रहे हैं।


ज्वेलर्स भी अछूते नहीं लूटने में एक गेहने में कितने टांके लगे हैं, कितनी खोट है उस ज़ेवर में उसका वज़न भी सोने के मूल्य बराबर लेते हैं ग्राहक को इन सब बातों के बारे में नहीं पता, जिसका फायदा ये ज्वेलर्स उठा रहे हैं आर्थिक हिंसा करने में ये भी पीछे नहीं।


पेट्रोल और डीज़ल पम्प के मालिक भी पेट्रोल और डीज़ल में मिट्‌टी का तेल मिला कर वाहन चालकों के साथ धोखा कर रहे हैं। ये भी हिंसा का ही एक रूप है।


केमिस्ट की दुकान पर मिलने वाली ब्राण्डेड दवाईयों की नकली दवाईयां मिलती है। इन नकली दवाईयों में मुनाफा ज़्यादा मिलता है उनको, ये भी हिंसा ही कर रहे हैं।


राशन की दुकानों पर मिलने वाला अनाज निम्न स्तर का होता है मिलावटी, कंकड, पत्थर मिला हुआ । स्वच्छ अनाज की आप मात्र कोरी कल्पना कर सकते हैं। इसे भी हिंसा कह सकते हैं।


बैंकों के कामकाज पर आश्चर्य होता है, ग्राहक को पता ही नहीं चलता कब उसके होम लोन की ब्याज दर की वृद्धि हो गयी है कर्ज़ का बोझ ज्यों का त्यों पड़ा रहता है बैंक भी एक तरह से हिंसा कर रहे हैं


मित्रो आर्थिक हिंसा में भले ही खून-खराबा न दिखता हो लेकिन आर्थिक नुकसान हर परिवार पर चोट कर रहा है, विकास में रोडे अटका रहा है। इसके लिये हम ही जिम्मेवार हैं, पीडित हैं, हमारी सरकार भी संसद में बयान देने के सिवाय कुछ नहीं करती। कड़े क़ानून सिर्फ़ क़ानून की किताबों में ही पढनें को मिलते हैं और अगर अपराधी को सज़ा मिलती भी है तो वो भी न के बराबर, सबके हौसले बुलन्द हैं। रिश्वत और मुनाफे का एक बड़ा वृक्ष हमारे भीतर फैल गया है इसकी जडें बहुत गहरी धस गयी हैं। इनको काटना कठीन हो रहा है। गलत तरीके से रूपये कमाने वाला दानव हमारे अंदर पल रहा है इसे हमें ही खदेडना होगा। क्या ये संभव है ?

Monday, June 28, 2010

सियासतदाँ (राजनीतिज्ञ)

मित्रो एक रचना पेश कर रहा हूँ , इसमें  एक राजनीतिज्ञ क्या सोच रहा है
अपने देश और समाज के बारे में और उसका अपना स्वार्थ कैसे हल हो इसकी उसको चिंता है .....

सियासतदाँ (राजनीतिज्ञ) 

एक आसां नया हुनर सीखना चाहता हूँ,
सारे जग को पल में ख़रीदना चाहता हूँ


ये   सियासत क्या है एक खेल के सिवा,
जो  दांव खेला  है  वो जीतना  चाहता हूँ


ना जुर्म कबूल है न  क़ानून  पर चलूँगा,
क़ानून   को  पैरों   तले  रौंदना  चाहता हूँ


फिक्र क्या है, दर्द क्या है अपनी बला से,
अपनी  ज़िंदगी ठाठ   से जीना चाहता हूँ


कोई फरियादी,  मज़लूम  भीड़  पसंद नहीं,
पाँच साल में एक बार मिलना चाहता हूँ


झूठ,   फरेब,   दिलासे   ये  हथियार हमारे,
इनके शिकंजे में सबको भीचना चाहता हूँ


दौलत,  सत्ता,  एशो - आराम  बहोत  प्यारे, 
''रत्ती''  इनको   मैं  नहीं  खोना  चाहता हूँ

Friday, June 18, 2010

मौज-दर-मौज

मौज-दर-मौज

इस वक्त की तल्खीयों का
बोझ सबके शानों पर है
ऐसे लम्हात में इम्तहाँ से 
रोज रू-ब-रू होना पडता है
दरीचे दिल के जो, खोलोगे तो पाओगे
छोटे-छोटे रोज़न नहीं इसमें
बड़े-बड़े दर हैं
यहाँ से तो दर्दों के काफ़िले गुज़र सकते हैं 
इस मंज़र की पैकर 
लोगों के ज़हन में ऐसी उतरी है
बाक़ी बची ज़िंदगी में ख़ौफ के साये 
हमारे पीछे दौड़ेंगे
जैसे गली के कुत्ते
अजनबीयों पर टूट पड़ते हैं 
डरा-डरा सहमा हुआ आदमी
अपने जिस्मो-जां को
किसी तरह संभालता है
ये हर रोज़ की हिकारत 
ख़ुद-ब-ख़ुद पेश आती रहती है
मौज-दर-मौज सबके सामने .....

Monday, May 31, 2010

रूसवाई

रूसवाई



बड़े बेरहम होते हैं रूसवाई के रास्ते,
वो खोज रहा है अपनी रिहाई के रास्ते


एक जोश  था अजीब जुनूँ था उसे परवाज़ का,
न जुर्रत कर सका देखे तमाशाई के रास्ते


एक मज़बूत क़फ़स में सिमट गया है जिस्म उसका,
जौफ में ढून्ढता है वो तवानाई के रास्ते


वक़्त  बेवक्त जगाते  पहरेदार अरमानों को,
याद आते हैं अपनी बेनवाई के रास्ते


न वाकिफ अन्जाम से खतावार मुमकिन नहीं,
दोज़ख से भी हिरासां तन्हाई के रास्ते


जुर्म से झूक जाता है सर इज्ज़तदार का,
कहाँ खो गये ''रत्ती'' बेरियाई के रास्ते


शब्दार्थ 
जौफ = कमज़ोर, तवानाई = ताक़त, शक्ति 
बेनवाई = कंगाली, बेरियाई = निष्कपटता

Thursday, April 22, 2010

जोगी

जोगी


राम की अमृत-वाणी रसीली,
कर लो पान इसका जोगी रे


वो घट-घट वासी सर्वत्र बसे,
करो ध्यान उसका जोगी रे


बन-बन घूमने से ना मिलेगा
सबके दिल में बसता जोगी रे


जगत के सारे काम हैं झूठे,
उसमें क्यों फसता जोगी रे


माया के लोभ कारन से ही,
रब से विमुखता जोगी रे


राम नाम रामबाण दवा है,
''रत्ती'' नहीं जपता जोगी रे

Tuesday, April 20, 2010

बादल

बादल


एक निगाह झरोखे को चीरती
निहारती बड़े  अदब से
दिल ही दिल में पुकारती
तिश्नगी  लबों पे लिये
हलक सहलाते-सहलाते
फलक़ की तरफ देखा उसने
आफताब अपनी पूरी ताक़त  के साथ
तमाज़त बरसा रहा था
ज़मीं तो तवे जैसी तप रही थी
पांव रखते ही जलने का अहसास कराती
इधर कुछ दिनों से साज़ीश की बू आने लगी है
सूरज ने बादल से दोस्ताना बढ़ाया है
दोनों ने मिल कर हमारा खून  सुखाया है
सियासत की कौन सी चाल कब खेलनी है
अवाम को कैसे धोखा देना है
और फिर ऐसा मालूम होता है
बादल अब सरकारी मुलाज़िम हो गये हैं
जब चाहा आते हैं और जब चाहा चले जाते हैं
बेरोकटोक
ये बड़े हरजाई हैं
बरसते हैं तो समंदरों के सीने पर
झरनों के माथे पर,
नदिया के निचले किनारे पर
और मेहरबां हैं संगदिल पर्बतों पर
उनको नेहलाते हैं, ठन्डक देते हैं
मासूमियत भरे चेहरे लिये ताक़ते  हैं
सूखी बंजर ज़मीं की ओर
ऐसा जतलाते हैं वो नावाकिफ़ हैं
यहाँ के हालात से
तुम अज़ीम बन के न फिरो
तुम्हारा ये रवैय्या नागवार है हमको
इतने बेरहम न बनो
बस एक इल्तजा है तुमसे
बरसो बरसो बरसो ..... 

Thursday, April 8, 2010

उतावले शब्द

उतावले शब्द


सजल नयनों की भाषा
में थी अजीब निराशा
निराशा में छुपा था नवीन सपना
अनदेखा दृश्य कुछ कहानियाँ, बातें
और मस्तक की सिलवटों के पीछे नेत्र
जिनमें  बसा था एक शहर
सुनसान
उन अधरों पर थे अनगिनत उतावले शब्द
जो पड़े रहे, अटके रहे
कई दिनों, महीनों
मन बुद्धि के निर्णय की राह तकते
उचित समय की बाट जोहते
क़ैद होकर रह गए
मन की चारदिवारी में
भीतर के घमासान में
पिसते-पिसते धुल हो गए .....

Wednesday, April 7, 2010

बदगुमानी

"बदगुमानी"


वो शिकार हो गया है बदगुमानी का,
वक़्त आया जैसे किसी की क़ुर्बानी का


कुछ लोगों की   होती अजीब हरकतें,
उम्दा सुबूत   पेश  करते   नादानी का


खुद गुमराह हुए हैं या किये गए हैं,
एक अनोखा सबब पाया परेशनी का


बदगुमां   दमाग   में   रोज़न   होने लगे,
बरपा बेमज़ा कहर शऊर मनमानी का


जाने कैसे "रत्ती" तौफ़ीक़ ने पाँव पसारे
नया फुतूर देखा हैरतअंगेज़ कहानी का

शब्दार्थ
बदगुमानी = गलत धारणा, गुमराह = पथभ्रष्ट
सबब = कारण, बदगुमां = संशयी, रोज़न = छेद, बरपा = उपस्थित
शऊर = तरीका, तौफ़ीक़ = हिम्मत, शक्ति, फ़ूतूर = दोष

Sunday, March 7, 2010

साये

साये


पहले   साये  चलते थे  अब बोलने  लगे,
मेरी  हंसी दुनियाँ में ज़हर घोलने लगे

जब रात गहरायी आंखें बंद होने लगी,
तो सपनों में डरावने  मंज़र दौड़ने लगे

जैसे  कोई तहक़ीकात कर रहा हो मेरी,
सारे  गुनाहों  की  फेहरिस्त  खोलने  लगे

ज़िन्दगी  की  शाम   दूर  से  तमाशा  देखे,
भूखे  सवेरे  अब   मेरी  सांसें मरोड़ने लगे

मैं बहोत मुतासिर था अपने अज़ीज़ों से,
मुझे देखते ही वो अपना मुँह मोड़ने लगे

“रत्ती“ मयख़ाने के सिवा कहाँ  जाते हम,
जाम पी पी के  सारे  गिलास तोड़ने लगे

Sunday, February 28, 2010

बुरा न मानो होली है

बुरा न मानो होली है


ये होली भी क्या होली है
चेहरे सब लाचार  से
रोनक तो गुम  हो गयी
लोग लगें बीमार से 


ज़हरीले रंगों से भैया
अंगों को बहुत ख़तरा
बेचनेवाले मुनाफा चाहें  
न मौत खरीदें बाज़ार से


इस होली में प्रेम नहीं है
छुपी नागिन वासना
जोर-ज़बरदस्ती से त्रस्त सब
और अटपटे व्यवहार से


नकली मावे की मिठाई से 
मुंह मीठा न कराओ 
रंग में भंग न हो जाये 
गुड खिला दो प्यार से 


मीठे शब्दों की चाशनी से 
चीनी का स्वाद ले लो 
सरकारी कड़वी नीतियों से घायल 
दुखी महंगाई की मार से 


होली के रंग चमकते रहते 
महंगाई अगर न होती
भोली जनता बड़ी ख़फ़ा
निकम्मी सरकार से


राधा मोहन की होली देखो
श्रद्धा प्रेम की खुशबू आवे
ग्वाल-बाल, रसिक भक्त
विभोर अमृत की बौछार से


और कुछ दे नहीं सकते
शुभकामना स्वीकार लें
"रत्ती" भर संतोष सही 
न गिला करो अपने यार से  

Monday, February 8, 2010

खता

खता


हम गल्तियाँ अक्सर रोज़ ही किया करते हैं,
ये भी सच है  के  दोष दूजे को  दिया  करते  हैं


ये   फितरत   है,   शरारत  है  या  नादानी  कोई,
सबक लेने   की न सोच  फिर   गिला करते हैं


अब   तलक   ये  तमाशा   यूँ    ही  चलता  रहा,
ज़िन्दगी को तमाशा   बना के जिया करते हैं 


कैसी-कैसी जंग  सही  ज़ख़्मी भी  हुआ  मगर,
मरहम   न   दिया   न मरहम  लिया   करते    हैं 


सपनो   की   दूनियाँ   में   राजा   ही  बनते    रहे,
हकीक़त ये  के नोकरी दूजे की किया करते हैं


शराब में ऐसा क्या है इसके बिना रह नहीं सकते,
पैसा न भी हो पास तो मांग के पीया करते हैं


"रत्ती" लम्बी  दूरियाँ खुद ही कम हो जाती हैं,
जब-जब   हम   अपने होटों   को   सिया करते   हैं

Wednesday, January 20, 2010

अहवाले बशर

अहवाले बशर



ये   नुक्स-ए-आबो-हवा  देखी  ज़माने में,
सदियां लग जाती लोगों को समझाने में


ये दौर-ए-गर्दिश है, इम्तहां लेता सबका, 
हर शख्स   मसरूफ नसीबा चमकाने में 


यहां जुर्म को बेरोकटोक रक्स करते देखा,
इंसाफ  को   शर्म   आयी  रू- ब- रू आने में 


कम लिबास में हूरें उड़ती हैं इन फ़ज़ाओं में,
नग्नता गली - गली में भलाई मुंह छिपाने में


अफ़साना - ए - फुरक़त   न   दोहराओ  तुम, 
बहोत मज़ा आता उनको  सितम   ढाने  में


माज़ी की खता से माकूल कदम उठाये न, 
तजुर्बा    रायगां   हयात  के    शामियाने  में


"रत्ती" अहवाले बशर न पूछो तुम हमसे,
उलझा रहता रात-दिन दौलत कमाने में


शब्दार्थ
नुक्स-ए-आबो-हवा = दूषित जलवायु
मसरूफ = व्यस्त, रक्स = नृत्य
अफ़साना-ए-फुरक़त = विरह की कहानी
माज़ी = गुज़रा हुआ समय, माकूल = उचित,

रायगां = व्यर्थ, हयात = जीवन
अहवाले बशर = मानव का हाल

Tuesday, January 5, 2010

दहर

दहर

राह-ए-दहर में   बातों के,  फसानें थे बहोत 
काली  रातों  में दिल में, अफ़साने  थे  बहोत   

मेरी   मौजूदगी  में जो,  कतराते   रहते थे,
जाने  के   बाद  होठों  पे,  तराने  थे    बहोत 

हम  ही अकेले  न  थे,  जो उनपे  मरते थे,
गली-गली,  गाँव-गाँव,  अनजाने  थे बहोत

रात दिन  घंटों उसका, इंतज़ार  करते  रहते,
उसकी इक  झलक पाने के, दिवाने थे बहोत 


उनसे  रब्त क़रीब का,  हैं  वो  दिल के  पास,
रूठे   एक   दिन  ऐसे  जैसे,  बेगाने  थे  बहोत 

हर लम्हा ज़ीस्त  का “रत्ती“, इम्तहान  सा लगे,
नसीब   को  नये   खेल,   आज़माने  थे   बहोत 

शब्दार्थ
राह-ए-दहर = जीवन की राह, रब्त = रिश्ता      

Tuesday, December 15, 2009

माहताब

माहताब
आज  चले  हैं वो फिर,  गुलशन को   मेहकानें,    
बहारों का इस्तक़बाल करो, और छेड़ो तराने


हम  उनकी अदाओं   को   देख,  दंग रह गये,
क्या नज़ारा  था,  नूर   था,  लगे मुँह छिपाने

हर कोई उसे अब,  माहताब   कहने लगा है,
बांध   लिया है  कशिश  में,  सब  हुए दिवाने


बारगाह   में  वीराने,   ज़ुल्मतों  में  जा छिपे,
तन्हाईयों को भी न मिले, ऐसे तन्हा ज़माने

अब शोर-ए-गिरयां   की,  बात  न   किया  करें,
शबे-खामोश में, दुनियाँ लगी है क़मर हिलाने


जहाँ रानाई बिछी हो, उसकी अदा हरी-भरी हो,
जैसे जन्नत चली आयी, "रत्ती" के होश उड़ानें

शब्दार्थ 
इस्तक़बाल = स्वागत, नूर = प्रकाश, माहताब = चाँद,
बारगाह = दरबार, ज़ुल्मत = अन्धेरा,
शोर-ए-गिरयां = रोने धोने का शोर, शब-ए-खामोश =  चुपरात,
रानाई = सुंदरता,

Monday, November 23, 2009

परायाधन

परायाधन - यह एक शब्द अपना अर्थ खुद बता रहा है,
लड़कियाँ परायाधन हैं, तो हम शुरू से ही मान कर चलते है,
जो चीज़ हमारी है ही नहीं, उस पर समय क्यों बर्बाद करें,
आदमी की ये हिंसक प्रवृति, बाहर नहीं मन के भीतर रहती है,
और समय-समय पर वह कटोतियाँ करता है,
चंद काग़ज़ के टुकडे़ बचा लेता है,
मन में हिंसक वारदातों का क्रम जारी रहता है,
भेद-भाव के कीडे़,
लड़की के जन्म से ही खोपड़ी में मंडराने लगते हैं,
योग्य होनहार अयोग्य बनी,
सारे मोहल्ले में गंवार ही रही,
अशिक्षित अंगूठा छाप रही,
दो आँखों में से एक आँख में किरकिरि जैसी,
किसी को अपने अधिकार से वंचित रखना
ऐसे ही है जैसे किसी स्वतंत्र पंछी के पंख काटना,
उसकी नीले गगन की उड़ान अधूरा स्वप्न बन कर रह जायेगी
आखिर बर्तन ही तो मांजने हैं लड़कियों को,
उनके लिए जो भी किया आधेमन से,
उत्थान की बातें करेनवाला समाज
आँखवाला अंधा होकर, टुकूर-टुकूर
उस बेला की बाट जोहता है,
कब इसके हाथ पीले होंगे, मन का बोझ कम होगा,
इतना ही नहीं, क्रुर मानव तो जन्म से पहले ही लड़कियों को
गोलोक में पहुंचाने की योजनाओं को
क्रियान्वित करने के लिये तत्पर दिखा,
कमअक्ल से बनी पतवार, भेद-भाव से भरी नाव को
कैसे पार लगायेगी?
माना के परायेधन पर हमारा अधिकार नहीं है,
लेकिन उसकी सुरक्षा के लिये हम कटीबद्ध जीव,
माँ-बाप विमुखता, संकीर्णता और सब लोग
नरक के द्वार खटखटाने में लगे हुए हैं
तो यमराज ने देखा और कहा ..... तथास्तु .....

Thursday, November 12, 2009

मेहरबां

मेहरबां
अगर मुट्ठी में  है वो   आसमां,
कोई न   कहेगा  तुमको  नातवाँ



शहंशाह  के  जैसी  होगी  जिंदगी,
हर   लम्हा  मस्ती  से  भरा  जवां



हर शख्स की जुबां पे रहेगा  नाम,
तेरा चर्चा होगा रोज़ हर सू बयां



चमक-दमक में   लिपटी  ज़ीस्त,
काले   अँधेरे  फिर  ठहरेंगे  कहाँ



हर शै क़दमों में हाज़िर पल में,
मयस्सर  हुआ  है   बिहिश्त   यहाँ 



रब ने बनाया हो जिसका नसीबा,
"रत्ती"  कौन  रोकेगा  सब मेहरबां     



 शब्दार्थ
नातवाँ - कमज़ोर, हर सू = चारों तरफ
ज़ीस्त = जीवन, मयस्सर = उपलब्ध,
बिहिश्त = स्वर्ग  

Friday, October 2, 2009

रूठना

रूठना

ज़िन्दगी तूने तो फक़त रूठना ही सीखा,
मेरे चैन को पल-पल लूटना ही सीखा


दिल तो नाज़ुक है शीशे  की तरह से,
तल्ख़ ज़ुबां का असर टूटना ही सीखा


मेरी गुस्ताखीयों को तौले वो तराज़ू में,
सवाब के  पलड़े ने न झूकना ही सीखा


काली रात ने डराया नींद से जगाया,
वो तो सूरज था उसने उगना ही सीखा


वक़्त के मुलायम हाथ सख्त हुए "रत्ती"
मेरी ख्वाहिशों का गला घोटना ही सीखा

Monday, September 28, 2009

रावण

रावण


आज अख़बार में एक ख़बर पढ़ी
रावण का कद छोटा हो गया है ।
मैं पढ़ कर थोड़ा हैरान हुआ
महंगाई ने भले ही रावण का कद
छोटा कर दिया हो
लेकिन रावणों के ग़लत मंसूबों पर
पानी फेरना अत्यंत कठिन काम है ।
रावण आज भी हमारे हृदय में बसता है ।
राम को दिल में रखने की जगह नहीं है ।
रावण के दस सिर हैं
और दस सिरों में से अनेक प्रकार के
विषय-विकार जन्म लेते हैं ।
आज के आधुनिक युग में,
विभीषण भी बहुत हैं
और रावण भी बहुत हैं
देश और धर्म की सेवा करनेवाले
विरले ही नज़र आते हैं ।
रावण वो विशाल वृक्ष है,
जिसकी जड़ों पर हर इंसान
अपने स्वार्थ का पानी डाल कर,
उसको पुष्टि देता है, ताक़त देता है ।
आज हम सब लोग रावण के हाथ
मज़बूत कर रहे हैं ।
कौन कहता है के रावण मर गया है,
उसका कद छोटा हो गया है ।
आप अपने इर्द-गिर्द देखेंगे तो
राम के भेस में रावण नज़र आयेंगे,
हम सभी रावण की ही भक्ति
रोज़ करते हैं ।
उसकी हर बुराई की नकल करते हैं,
उस पर अमल करते हैं ।
हमारे देश भारत में
प्रतिदिन सीता की इज्ज़त नीलाम होती है
और लोग सिर्फ़ तमाशा देखते हैं ।
आप कह सकते हैं, युग बदला है
लेकिन हमारा स्वभाव, हमारी बुरी आदतें
नहीं बदली ।
हमारे विषय-विकारों का दायरा,
रावण के कद से कई लाख गुणा बड़ा है ।
रावण हमारी प्रेरणा का साधन बन गया है ।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम के वचन
किताबों तक ही सीमित रह गये हैं
और हम सिर्फ़ रामराज की कल्पना ही
कर सकते हैं ।
आप ही बताईये रावण के भक्त
राम की भक्ति कैसे कर सकते हैं?
मन में राम को बसा लो या रावण को,
क्योंकि मन तो हमारे पास एक ही है ।
गुरूग्रंथ साहिब की गुरूबाणी में लिखा है
"एक लख पूत सवा लख नाती
तिस रावण के घर दीया न बाती"
तो साथीयो कहने का अर्थ यह है
बुराई पर अच्छाई कि विजय अवश्य होगी ।
ये बात आप स्वर्ण अक्षरों में लिख लो ।

Sunday, September 6, 2009

हयात

हयात
थोड़ा-थोड़ा जीता हूँ ज़रा-ज़रा मरता हूँ,
ग़मों की आग में सुलगता हूँ जलता हूँ

ख़ुश्क अरमां हैं दम-खम भी नहीं बचा,
बेसाख्ता मिज़ाज न बिगड़े संभलता हूँ

हयात में तंदखू-ओ-बरहम भी मिले,
उलझ न जाऊँ किसी से मैं डरता हूँ

ख़ुद-परस्ती का शोर-गुल कानों में पड़ा,
कशमकश में बिना वजह उलझता हूँ

कहाँ तलक परेशानियां कोई सहन करे,
इसीलिये हर क़दम फूँक के धरता हूँ

तमाम शब एक तदबीर की तलाश रही,
बस जाहिलों के मानिन्द हाथ मलता हूँ

कुछ पल उपरवाले को याद करूँ लेकिन,
एक लम्हा भी ख़ुदा की इबादत न करता हूँ

मैं वफ़ा के कसीदे किसको सुनाऊँ "रत्ती"
दुनियाँ अपनी राह मैं अपनी राह चलता हूँ

शब्दार्थ

हयात - जीवन, बेसाख्ता - अचानक,
तंदखू - तेज़, बरहम - अप्रसन्न



Friday, September 4, 2009

अच्छा नहीं


अच्छा नहीं

मुझे बेवफा न समझो, ये अच्छा नहीं

सच तो आयेगा सामने, छुप सकता नहीं

मुझे बेवफा न समझो .....


माना के हमसे कोई, ख़ता हुई होगी,

ज़रा सी चोट से कोई, मर सकता नहीं

मुझे बेवफा न समझो .....


तुम मेरे हमसफर हो, मेरा भी तो हक़ है,

तुमको मैं छेड़ दूँ, तो कुछ घटता नहीं

मुझे बेवफा न समझो .....


अगर ऐसी बात है तो, हम चुप ही बेहतर,

ये नोक-झोंक, गिला-शिकवा, अच्छा नहीं

मुझे बेवफा न समझो .....


छोटी सी बात की, इतनी बड़ी सज़ा,

संगदिल भी रोता एक दिन, बचता नहीं

मुझे बेवफा न समझो .....


यक़ीं कर लो हमारा, मुहब्बत है तुमसे,

क्या करे "रत्ती", बिना बोले रह सकता नहीं

मुझे बेवफा न समझो .....

Wednesday, August 19, 2009

बेरंग

बेरंग
इस रंगीन दुनियाँ में,ज़िन्दगी बेरंग है,

ये कैसा अजूबा है मौला,हर शख्स तंग है

मायुसी है के बस,सर उठाने नहीं देती,

क़दम-क़दम पे लड़ाई,हर काम में जंग है

हुस्न और दौलतवालों को,दावत के पैग़ाम मिले,

सिमटा दायरा प्यार का,अपनी-अपनी पसंद है

फौलाद की बेड़ियाँ टूट जायेंगी,फ़रेब की नहीं,

अपनें ही जाल में आदमी,हो रहा नज़रबंद है

जद्दोजहद में इंसानियत,खो गयी है कहीं,

हड्डियों के ढांचे की, आवाज़ बुलन्द है

ना सुननें की आदत नहीं,हुक्म की तामील हो,

जी हज़ूरी करनेवाला,खिलौना ही पसंद है

मदरसे में पढे सबक,कुछ याद हैं कुछ भूल गये,

दो और दो पाँच करके,बनें दौलतमन्द है

सियासतदाँ ने कहा,पाँच साल बाद मिलेंगे "रत्ती"

तुम जियो या मरो,अपन तो अमन पसंद है


Tuesday, August 18, 2009

नेक दिल


नेक दिल
वो शमां जली के न जली,
पर रात ढली
अन्धेरों में सिमटी,
यादों की गली
मैंने लाख मनाया उसे,
मेरी एक न चली
ज़ुबां तल्ख़ तो कभी,
मिसरी की डली
जैसी भी है "रत्ती"
वो नेकदिल भली