Monday, June 28, 2010
सियासतदाँ (राजनीतिज्ञ)
अपने देश और समाज के बारे में और उसका अपना स्वार्थ कैसे हल हो इसकी उसको चिंता है .....
सियासतदाँ (राजनीतिज्ञ)
एक आसां नया हुनर सीखना चाहता हूँ,
सारे जग को पल में ख़रीदना चाहता हूँ
ये सियासत क्या है एक खेल के सिवा,
जो दांव खेला है वो जीतना चाहता हूँ
ना जुर्म कबूल है न क़ानून पर चलूँगा,
क़ानून को पैरों तले रौंदना चाहता हूँ
फिक्र क्या है, दर्द क्या है अपनी बला से,
अपनी ज़िंदगी ठाठ से जीना चाहता हूँ
कोई फरियादी, मज़लूम भीड़ पसंद नहीं,
पाँच साल में एक बार मिलना चाहता हूँ
झूठ, फरेब, दिलासे ये हथियार हमारे,
इनके शिकंजे में सबको भीचना चाहता हूँ
दौलत, सत्ता, एशो - आराम बहोत प्यारे,
''रत्ती'' इनको मैं नहीं खोना चाहता हूँ
Friday, June 18, 2010
मौज-दर-मौज
इस वक्त की तल्खीयों का
बोझ सबके शानों पर है
ऐसे लम्हात में इम्तहाँ से
रोज रू-ब-रू होना पडता है
दरीचे दिल के जो, खोलोगे तो पाओगे
छोटे-छोटे रोज़न नहीं इसमें
बड़े-बड़े दर हैं
यहाँ से तो दर्दों के काफ़िले गुज़र सकते हैं
इस मंज़र की पैकर
लोगों के ज़हन में ऐसी उतरी है
बाक़ी बची ज़िंदगी में ख़ौफ के साये
हमारे पीछे दौड़ेंगे
जैसे गली के कुत्ते
अजनबीयों पर टूट पड़ते हैं
डरा-डरा सहमा हुआ आदमी
अपने जिस्मो-जां को
किसी तरह संभालता है
ये हर रोज़ की हिकारत
ख़ुद-ब-ख़ुद पेश आती रहती है
मौज-दर-मौज सबके सामने .....
Monday, May 31, 2010
रूसवाई
बड़े बेरहम होते हैं रूसवाई के रास्ते,
वो खोज रहा है अपनी रिहाई के रास्ते
एक जोश था अजीब जुनूँ था उसे परवाज़ का,
न जुर्रत कर सका देखे तमाशाई के रास्ते
एक मज़बूत क़फ़स में सिमट गया है जिस्म उसका,
जौफ में ढून्ढता है वो तवानाई के रास्ते
वक़्त बेवक्त जगाते पहरेदार अरमानों को,
याद आते हैं अपनी बेनवाई के रास्ते
न वाकिफ अन्जाम से खतावार मुमकिन नहीं,
दोज़ख से भी हिरासां तन्हाई के रास्ते
जुर्म से झूक जाता है सर इज्ज़तदार का,
कहाँ खो गये ''रत्ती'' बेरियाई के रास्ते
शब्दार्थ
जौफ = कमज़ोर, तवानाई = ताक़त, शक्ति
बेनवाई = कंगाली, बेरियाई = निष्कपटता
Thursday, April 22, 2010
जोगी
राम की अमृत-वाणी रसीली,
कर लो पान इसका जोगी रे
वो घट-घट वासी सर्वत्र बसे,
करो ध्यान उसका जोगी रे
बन-बन घूमने से ना मिलेगा
सबके दिल में बसता जोगी रे
जगत के सारे काम हैं झूठे,
उसमें क्यों फसता जोगी रे
माया के लोभ कारन से ही,
रब से विमुखता जोगी रे
राम नाम रामबाण दवा है,
''रत्ती'' नहीं जपता जोगी रे
Tuesday, April 20, 2010
बादल
एक निगाह झरोखे को चीरती
निहारती बड़े अदब से
दिल ही दिल में पुकारती
तिश्नगी लबों पे लिये
हलक सहलाते-सहलाते
फलक़ की तरफ देखा उसने
आफताब अपनी पूरी ताक़त के साथ
तमाज़त बरसा रहा था
ज़मीं तो तवे जैसी तप रही थी
पांव रखते ही जलने का अहसास कराती
इधर कुछ दिनों से साज़ीश की बू आने लगी है
सूरज ने बादल से दोस्ताना बढ़ाया है
दोनों ने मिल कर हमारा खून सुखाया है
सियासत की कौन सी चाल कब खेलनी है
अवाम को कैसे धोखा देना है
और फिर ऐसा मालूम होता है
बादल अब सरकारी मुलाज़िम हो गये हैं
जब चाहा आते हैं और जब चाहा चले जाते हैं
बेरोकटोक
ये बड़े हरजाई हैं
बरसते हैं तो समंदरों के सीने पर
झरनों के माथे पर,
नदिया के निचले किनारे पर
और मेहरबां हैं संगदिल पर्बतों पर
उनको नेहलाते हैं, ठन्डक देते हैं
मासूमियत भरे चेहरे लिये ताक़ते हैं
सूखी बंजर ज़मीं की ओर
ऐसा जतलाते हैं वो नावाकिफ़ हैं
यहाँ के हालात से
तुम अज़ीम बन के न फिरो
तुम्हारा ये रवैय्या नागवार है हमको
इतने बेरहम न बनो
बस एक इल्तजा है तुमसे
बरसो बरसो बरसो .....
Thursday, April 8, 2010
उतावले शब्द
सजल नयनों की भाषा
में थी अजीब निराशा
निराशा में छुपा था नवीन सपना
अनदेखा दृश्य कुछ कहानियाँ, बातें
और मस्तक की सिलवटों के पीछे नेत्र
जिनमें बसा था एक शहर
सुनसान
उन अधरों पर थे अनगिनत उतावले शब्द
जो पड़े रहे, अटके रहे
कई दिनों, महीनों
मन बुद्धि के निर्णय की राह तकते
उचित समय की बाट जोहते
क़ैद होकर रह गए
मन की चारदिवारी में
भीतर के घमासान में
पिसते-पिसते धुल हो गए .....
Wednesday, April 7, 2010
बदगुमानी
वो शिकार हो गया है बदगुमानी का,
वक़्त आया जैसे किसी की क़ुर्बानी का
कुछ लोगों की होती अजीब हरकतें,
उम्दा सुबूत पेश करते नादानी का
खुद गुमराह हुए हैं या किये गए हैं,
एक अनोखा सबब पाया परेशनी का
बदगुमां दमाग में रोज़न होने लगे,
बरपा बेमज़ा कहर शऊर मनमानी का
जाने कैसे "रत्ती" तौफ़ीक़ ने पाँव पसारे
नया फुतूर देखा हैरतअंगेज़ कहानी का
शब्दार्थ
बदगुमानी = गलत धारणा, गुमराह = पथभ्रष्ट
सबब = कारण, बदगुमां = संशयी, रोज़न = छेद, बरपा = उपस्थित
शऊर = तरीका, तौफ़ीक़ = हिम्मत, शक्ति, फ़ूतूर = दोष
Sunday, March 7, 2010
साये
पहले साये चलते थे अब बोलने लगे,
मेरी हंसी दुनियाँ में ज़हर घोलने लगे
जब रात गहरायी आंखें बंद होने लगी,
तो सपनों में डरावने मंज़र दौड़ने लगे
जैसे कोई तहक़ीकात कर रहा हो मेरी,
सारे गुनाहों की फेहरिस्त खोलने लगे
ज़िन्दगी की शाम दूर से तमाशा देखे,
भूखे सवेरे अब मेरी सांसें मरोड़ने लगे
मैं बहोत मुतासिर था अपने अज़ीज़ों से,
मुझे देखते ही वो अपना मुँह मोड़ने लगे
“रत्ती“ मयख़ाने के सिवा कहाँ जाते हम,
जाम पी पी के सारे गिलास तोड़ने लगे
Sunday, February 28, 2010
बुरा न मानो होली है
ये होली भी क्या होली है
चेहरे सब लाचार से
रोनक तो गुम हो गयी
लोग लगें बीमार से
ज़हरीले रंगों से भैया
अंगों को बहुत ख़तरा
बेचनेवाले मुनाफा चाहें
न मौत खरीदें बाज़ार से
इस होली में प्रेम नहीं है
छुपी नागिन वासना
जोर-ज़बरदस्ती से त्रस्त सब
और अटपटे व्यवहार से
नकली मावे की मिठाई से
मुंह मीठा न कराओ
रंग में भंग न हो जाये
गुड खिला दो प्यार से
मीठे शब्दों की चाशनी से
चीनी का स्वाद ले लो
सरकारी कड़वी नीतियों से घायल
दुखी महंगाई की मार से
होली के रंग चमकते रहते
महंगाई अगर न होती
भोली जनता बड़ी ख़फ़ा
निकम्मी सरकार से
राधा मोहन की होली देखो
श्रद्धा प्रेम की खुशबू आवे
ग्वाल-बाल, रसिक भक्त
विभोर अमृत की बौछार से
और कुछ दे नहीं सकते
शुभकामना स्वीकार लें
"रत्ती" भर संतोष सही
न गिला करो अपने यार से
Monday, February 8, 2010
खता
हम गल्तियाँ अक्सर रोज़ ही किया करते हैं,
ये भी सच है के दोष दूजे को दिया करते हैं
ये फितरत है, शरारत है या नादानी कोई,
सबक लेने की न सोच फिर गिला करते हैं
अब तलक ये तमाशा यूँ ही चलता रहा,
ज़िन्दगी को तमाशा बना के जिया करते हैं
कैसी-कैसी जंग सही ज़ख़्मी भी हुआ मगर,
मरहम न दिया न मरहम लिया करते हैं
सपनो की दूनियाँ में राजा ही बनते रहे,
हकीक़त ये के नोकरी दूजे की किया करते हैं
शराब में ऐसा क्या है इसके बिना रह नहीं सकते,
पैसा न भी हो पास तो मांग के पीया करते हैं
"रत्ती" लम्बी दूरियाँ खुद ही कम हो जाती हैं,
जब-जब हम अपने होटों को सिया करते हैं
Wednesday, January 20, 2010
अहवाले बशर
ये नुक्स-ए-आबो-हवा देखी ज़माने में,
सदियां लग जाती लोगों को समझाने में
ये दौर-ए-गर्दिश है, इम्तहां लेता सबका,
हर शख्स मसरूफ नसीबा चमकाने में
यहां जुर्म को बेरोकटोक रक्स करते देखा,
इंसाफ को शर्म आयी रू- ब- रू आने में
कम लिबास में हूरें उड़ती हैं इन फ़ज़ाओं में,
नग्नता गली - गली में भलाई मुंह छिपाने में
अफ़साना - ए - फुरक़त न दोहराओ तुम,
बहोत मज़ा आता उनको सितम ढाने में
माज़ी की खता से माकूल कदम उठाये न,
तजुर्बा रायगां हयात के शामियाने में
"रत्ती" अहवाले बशर न पूछो तुम हमसे,
उलझा रहता रात-दिन दौलत कमाने में
शब्दार्थ
नुक्स-ए-आबो-हवा = दूषित जलवायु
मसरूफ = व्यस्त, रक्स = नृत्य
अफ़साना-ए-फुरक़त = विरह की कहानी
माज़ी = गुज़रा हुआ समय, माकूल = उचित,
रायगां = व्यर्थ, हयात = जीवन
अहवाले बशर = मानव का हाल
Tuesday, January 5, 2010
दहर
राह-ए-दहर में बातों के, फसानें थे बहोत
काली रातों में दिल में, अफ़साने थे बहोत
मेरी मौजूदगी में जो, कतराते रहते थे,
जाने के बाद होठों पे, तराने थे बहोत
हम ही अकेले न थे, जो उनपे मरते थे,
गली-गली, गाँव-गाँव, अनजाने थे बहोत
रात दिन घंटों उसका, इंतज़ार करते रहते,
उसकी इक झलक पाने के, दिवाने थे बहोत
उनसे रब्त क़रीब का, हैं वो दिल के पास,
रूठे एक दिन ऐसे जैसे, बेगाने थे बहोत
हर लम्हा ज़ीस्त का “रत्ती“, इम्तहान सा लगे,
नसीब को नये खेल, आज़माने थे बहोत
शब्दार्थ
राह-ए-दहर = जीवन की राह, रब्त = रिश्ता
Tuesday, December 15, 2009
माहताब
आज चले हैं वो फिर, गुलशन को मेहकानें,
बहारों का इस्तक़बाल करो, और छेड़ो तराने
हम उनकी अदाओं को देख, दंग रह गये,
क्या नज़ारा था, नूर था, लगे मुँह छिपाने
हर कोई उसे अब, माहताब कहने लगा है,
बांध लिया है कशिश में, सब हुए दिवाने
बारगाह में वीराने, ज़ुल्मतों में जा छिपे,
तन्हाईयों को भी न मिले, ऐसे तन्हा ज़माने
अब शोर-ए-गिरयां की, बात न किया करें,
शबे-खामोश में, दुनियाँ लगी है क़मर हिलाने
जहाँ रानाई बिछी हो, उसकी अदा हरी-भरी हो,
जैसे जन्नत चली आयी, "रत्ती" के होश उड़ानें
शब्दार्थ
इस्तक़बाल = स्वागत, नूर = प्रकाश, माहताब = चाँद,
बारगाह = दरबार, ज़ुल्मत = अन्धेरा,
शोर-ए-गिरयां = रोने धोने का शोर, शब-ए-खामोश = चुपरात,
रानाई = सुंदरता,
Monday, November 23, 2009
परायाधन
लड़कियाँ परायाधन हैं, तो हम शुरू से ही मान कर चलते है,
जो चीज़ हमारी है ही नहीं, उस पर समय क्यों बर्बाद करें,
आदमी की ये हिंसक प्रवृति, बाहर नहीं मन के भीतर रहती है,
और समय-समय पर वह कटोतियाँ करता है,
चंद काग़ज़ के टुकडे़ बचा लेता है,
मन में हिंसक वारदातों का क्रम जारी रहता है,
भेद-भाव के कीडे़,
लड़की के जन्म से ही खोपड़ी में मंडराने लगते हैं,
योग्य होनहार अयोग्य बनी,
सारे मोहल्ले में गंवार ही रही,
अशिक्षित अंगूठा छाप रही,
दो आँखों में से एक आँख में किरकिरि जैसी,
किसी को अपने अधिकार से वंचित रखना
ऐसे ही है जैसे किसी स्वतंत्र पंछी के पंख काटना,
उसकी नीले गगन की उड़ान अधूरा स्वप्न बन कर रह जायेगी
आखिर बर्तन ही तो मांजने हैं लड़कियों को,
उनके लिए जो भी किया आधेमन से,
उत्थान की बातें करेनवाला समाज
आँखवाला अंधा होकर, टुकूर-टुकूर
उस बेला की बाट जोहता है,
कब इसके हाथ पीले होंगे, मन का बोझ कम होगा,
इतना ही नहीं, क्रुर मानव तो जन्म से पहले ही लड़कियों को
गोलोक में पहुंचाने की योजनाओं को
क्रियान्वित करने के लिये तत्पर दिखा,
कमअक्ल से बनी पतवार, भेद-भाव से भरी नाव को
कैसे पार लगायेगी?
माना के परायेधन पर हमारा अधिकार नहीं है,
लेकिन उसकी सुरक्षा के लिये हम कटीबद्ध जीव,
माँ-बाप विमुखता, संकीर्णता और सब लोग
नरक के द्वार खटखटाने में लगे हुए हैं
तो यमराज ने देखा और कहा ..... तथास्तु .....
Thursday, November 12, 2009
मेहरबां
अगर मुट्ठी में है वो आसमां,
कोई न कहेगा तुमको नातवाँ
शहंशाह के जैसी होगी जिंदगी,
हर लम्हा मस्ती से भरा जवां
हर शख्स की जुबां पे रहेगा नाम,
तेरा चर्चा होगा रोज़ हर सू बयां
चमक-दमक में लिपटी ज़ीस्त,
काले अँधेरे फिर ठहरेंगे कहाँ
हर शै क़दमों में हाज़िर पल में,
मयस्सर हुआ है बिहिश्त यहाँ
रब ने बनाया हो जिसका नसीबा,
"रत्ती" कौन रोकेगा सब मेहरबां
शब्दार्थ
नातवाँ - कमज़ोर, हर सू = चारों तरफ
ज़ीस्त = जीवन, मयस्सर = उपलब्ध,
बिहिश्त = स्वर्ग
Friday, October 2, 2009
रूठना
ज़िन्दगी तूने तो फक़त रूठना ही सीखा,
मेरे चैन को पल-पल लूटना ही सीखा
दिल तो नाज़ुक है शीशे की तरह से,
तल्ख़ ज़ुबां का असर टूटना ही सीखा
मेरी गुस्ताखीयों को तौले वो तराज़ू में,
सवाब के पलड़े ने न झूकना ही सीखा
काली रात ने डराया नींद से जगाया,
वो तो सूरज था उसने उगना ही सीखा
वक़्त के मुलायम हाथ सख्त हुए "रत्ती"
मेरी ख्वाहिशों का गला घोटना ही सीखा
Monday, September 28, 2009
रावण
आज अख़बार में एक ख़बर पढ़ी
रावण का कद छोटा हो गया है ।
मैं पढ़ कर थोड़ा हैरान हुआ
महंगाई ने भले ही रावण का कद
छोटा कर दिया हो
लेकिन रावणों के ग़लत मंसूबों पर
पानी फेरना अत्यंत कठिन काम है ।
रावण आज भी हमारे हृदय में बसता है ।
राम को दिल में रखने की जगह नहीं है ।
रावण के दस सिर हैं
और दस सिरों में से अनेक प्रकार के
विषय-विकार जन्म लेते हैं ।
आज के आधुनिक युग में,
विभीषण भी बहुत हैं
और रावण भी बहुत हैं
देश और धर्म की सेवा करनेवाले
विरले ही नज़र आते हैं ।
रावण वो विशाल वृक्ष है,
जिसकी जड़ों पर हर इंसान
अपने स्वार्थ का पानी डाल कर,
उसको पुष्टि देता है, ताक़त देता है ।
आज हम सब लोग रावण के हाथ
मज़बूत कर रहे हैं ।
कौन कहता है के रावण मर गया है,
उसका कद छोटा हो गया है ।
आप अपने इर्द-गिर्द देखेंगे तो
राम के भेस में रावण नज़र आयेंगे,
हम सभी रावण की ही भक्ति
रोज़ करते हैं ।
उसकी हर बुराई की नकल करते हैं,
उस पर अमल करते हैं ।
हमारे देश भारत में
प्रतिदिन सीता की इज्ज़त नीलाम होती है
और लोग सिर्फ़ तमाशा देखते हैं ।
आप कह सकते हैं, युग बदला है
लेकिन हमारा स्वभाव, हमारी बुरी आदतें
नहीं बदली ।
हमारे विषय-विकारों का दायरा,
रावण के कद से कई लाख गुणा बड़ा है ।
रावण हमारी प्रेरणा का साधन बन गया है ।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम के वचन
किताबों तक ही सीमित रह गये हैं
और हम सिर्फ़ रामराज की कल्पना ही
कर सकते हैं ।
आप ही बताईये रावण के भक्त
राम की भक्ति कैसे कर सकते हैं?
मन में राम को बसा लो या रावण को,
क्योंकि मन तो हमारे पास एक ही है ।
गुरूग्रंथ साहिब की गुरूबाणी में लिखा है
"एक लख पूत सवा लख नाती
तिस रावण के घर दीया न बाती"
तो साथीयो कहने का अर्थ यह है
बुराई पर अच्छाई कि विजय अवश्य होगी ।
ये बात आप स्वर्ण अक्षरों में लिख लो ।
Sunday, September 6, 2009
हयात
थोड़ा-थोड़ा जीता हूँ ज़रा-ज़रा मरता हूँ,
ग़मों की आग में सुलगता हूँ जलता हूँ
ख़ुश्क अरमां हैं दम-खम भी नहीं बचा,
बेसाख्ता मिज़ाज न बिगड़े संभलता हूँ
हयात में तंदखू-ओ-बरहम भी मिले,
उलझ न जाऊँ किसी से मैं डरता हूँ
ख़ुद-परस्ती का शोर-गुल कानों में पड़ा,
कशमकश में बिना वजह उलझता हूँ
कहाँ तलक परेशानियां कोई सहन करे,
इसीलिये हर क़दम फूँक के धरता हूँ
तमाम शब एक तदबीर की तलाश रही,
बस जाहिलों के मानिन्द हाथ मलता हूँ
कुछ पल उपरवाले को याद करूँ लेकिन,
एक लम्हा भी ख़ुदा की इबादत न करता हूँ
मैं वफ़ा के कसीदे किसको सुनाऊँ "रत्ती"
दुनियाँ अपनी राह मैं अपनी राह चलता हूँ
शब्दार्थ
हयात - जीवन, बेसाख्ता - अचानक,
तंदखू - तेज़, बरहम - अप्रसन्न
Friday, September 4, 2009
अच्छा नहीं
अच्छा नहीं
मुझे बेवफा न समझो, ये अच्छा नहीं
सच तो आयेगा सामने, छुप सकता नहीं
मुझे बेवफा न समझो .....
माना के हमसे कोई, ख़ता हुई होगी,
ज़रा सी चोट से कोई, मर सकता नहीं
मुझे बेवफा न समझो .....
तुम मेरे हमसफर हो, मेरा भी तो हक़ है,
तुमको मैं छेड़ दूँ, तो कुछ घटता नहीं
मुझे बेवफा न समझो .....
अगर ऐसी बात है तो, हम चुप ही बेहतर,
ये नोक-झोंक, गिला-शिकवा, अच्छा नहीं
मुझे बेवफा न समझो .....
छोटी सी बात की, इतनी बड़ी सज़ा,
संगदिल भी रोता एक दिन, बचता नहीं
मुझे बेवफा न समझो .....
यक़ीं कर लो हमारा, मुहब्बत है तुमसे,
क्या करे "रत्ती", बिना बोले रह सकता नहीं
मुझे बेवफा न समझो .....
Wednesday, August 19, 2009
बेरंग
इस रंगीन दुनियाँ में,ज़िन्दगी बेरंग है,
ये कैसा अजूबा है मौला,हर शख्स तंग है
मायुसी है के बस,सर उठाने नहीं देती,
क़दम-क़दम पे लड़ाई,हर काम में जंग है
हुस्न और दौलतवालों को,दावत के पैग़ाम मिले,
सिमटा दायरा प्यार का,अपनी-अपनी पसंद है
फौलाद की बेड़ियाँ टूट जायेंगी,फ़रेब की नहीं,
अपनें ही जाल में आदमी,हो रहा नज़रबंद है
जद्दोजहद में इंसानियत,खो गयी है कहीं,
हड्डियों के ढांचे की, आवाज़ बुलन्द है
ना सुननें की आदत नहीं,हुक्म की तामील हो,
जी हज़ूरी करनेवाला,खिलौना ही पसंद है
मदरसे में पढे सबक,कुछ याद हैं कुछ भूल गये,
दो और दो पाँच करके,बनें दौलतमन्द है
सियासतदाँ ने कहा,पाँच साल बाद मिलेंगे "रत्ती"
तुम जियो या मरो,अपन तो अमन पसंद है
Tuesday, August 18, 2009
नेक दिल

वो शमां जली के न जली,
पर रात ढली
अन्धेरों में सिमटी,
यादों की गली
मैंने लाख मनाया उसे,
मेरी एक न चली
ज़ुबां तल्ख़ तो कभी,
मिसरी की डली
जैसी भी है "रत्ती"
वो नेकदिल भली
Monday, July 27, 2009
दूरियाँ
दूरियाँ Sunday, July 19, 2009
एक सच
क्षण में जनम हो रहा
और विलय भी हो रहा
आस-निरास पर टिका
ये जीवन भी रो रहा
आम के बदले तू धरा में
क्यों बबूल बो रहा
पीड़ा से भरे मन को
आंसुओं से धो रहा
कुंभकरण की भांति मनुष्य
है आज भी सो रहा
बहुमूल्य सभ्यता,प्रथा,
संस्कृति भी खो रहा .....
कब तलक

कब तलक
यादों के सहारे बैठे रहेंगे कब तलक,
आंखें थक गयी खुले न मेरी पलक
मेहरबां तुम्हें याद नहीं अपने वादे,
सपनों में ही सही दिखा दो एक झलक
एक चान्द को दिल में बसाया था मैंने,
वो चान्द जा बैठा बहोत दूर फलक
जो जाम आंखों से पिलाये वो थे रसीले,
"रत्ती" आज पीला दो मेरा सूखा है हलक
Saturday, July 18, 2009
हिंसा
हिंसा
वफ़ा-जफ़ा की बातें दोहरायी गयी,
नज़रें लाल सुर्ख फिर लड़ायी गयी
क़यामत को बुलाने का इरादा है उनका,
जिस्मों पे ज़ोर से तलवार लहरायी गयी
वो क्या जानें लहू बेशकीमती है,
बहा दी नदियाँ साँसें रूकवायी गयी
लाशों की सेज पे चले हंस्ते हुए,
गली-गली खुशीयाँ मनायी गयी
कटे जिस्म के टुकड़े पूछते हैं सबसे,
क्यों नफ़रत की आग लगायी गयी
किसका गुनाह कितना बड़ा मालूम नहीं,
बस तश्दुद्द कू-ब-कू फैलायी गयी
ज़मीं के बाशिंदों ने सीखा अब तलक,
एक मज़हब की दिवार बनायी गयी
कहीं छोड़ आये प्यारे हबीब रहम को,
बड़े पीरों की संगत भी ठुकरायी गयी
हादिसों से दिल की दिवारें काँपती हैं "रत्ती",
मगर किसी की जां न बचायी गयी
Wednesday, June 3, 2009
दिनचर्या
चिड़ियों की चूँ-चूँ ने आभास कराया, भोर हो गयी है। भास्कर आँगन में आ गया है, अरे आज फिर देर हो गयी जैसे-तैसे स्नान करके तैयार हो जलपान ग्रहण किया और सड़क पर सरपट दौड़ लगायी, बस पकड़नें की। हाँफते-हाँफते जान गले में अटक गयी किसी तरह दफ्तर पहुंचा । चपरासी ने बताया, सेक्शन बहुत गरम है, साहब के कमरे से चिल्लानें की आवाज़ आ रही थी, गुस्से से लाल-पीले हो रहे थे, बेल बजी तो जैसे डर सतानें लगा साहब मेरे क़रीब आ पहुँचे, तो रामलाल, ये है तुम्हारे आने का समय, वो...वो... सर जी कुछ मेहमान घर में आये हैं सो थोड़ी देर हो गयी । हर आदमी बहानें बनानें में निपुण है। हर दिन एक नया बहाना। साहब ने वही अपना घिसा-पीटा भाषण दिया और जाते-जाते कह गये आज की तुम्हारी तनख्वाह काट ली जायेगी और अपने केबिन में चले गये। हे भगवान! आज का दिन भी बेकार हो गया । मैं रोज़ ही सोचता हूँ , सुबह जल्दी उठ कर दफ्तर जाऊँगा लेकिन परिस्थितीयों का गुलाम, मानव रात को एक बजे से पहले नहीं सोता, तो सुबह क्या ख़ाक जल्दी उठेगा वो ख़ैर, जैसे-तैसे दिन बीता, घर पहुँचा और फिर टीवी देखा, गाने सुनें, अख़बार के पन्नों में झाँकना शुरू किया भोजन खाया गप-गप-गप, फिर पड़ोसी ने खिड़की से आवाज़ लगायी रामलाल आ जाओ, मानों मन माँगी मुराद मिल गयी हो आज पत्ते तुम पीसो, पत्ते खेलते-खेलते रात के दो बज गये अरे, बहुत रात हो गयी, सुबह फिर काम पर जाना है। शुभ रात्री। सुबह फिर पक्षीयों और भास्कर ने दस्तक दी, देर से उठा और भाग-दौड़ शुरू कर दी, ये दिनचर्या बन गयी है हमारी। ज़िन्दगी एक ऐसे साँचे में ढली है, जिसका कोई आकार नहीं, टेढी-मेढी ज़िन्दगी, पग-पग पर नोंक-झोंक, अभी बहुत से कार्य अनछुए और अधूरे हैं और ज़िन्दगी तितर-बितर, ताश के बावन पत्तों में उल्झी हुई, मानव गुलाम अपनी ख़राब आदतों का और दोष भगवान और दुसरों को फिर कहता है शायद मेरे भाग्य में यही लिखा है।
भोला बचपन

भोला बचपन
आज़ादी के बाद भी, इन्कलाब न हो सका,
हमारे बच्चों के वास्ते, एहतसाब न हो सका
मासूम भला क्या जानें, हयात की दुशवारियाँ,
कलम, दवात, किताब का, हिसाब न हो सका
एक मासूमियत ही, झलकती चेहरे पे,
किसी हरे-भरे चमन का, गुलाब न हो सका
ज़िन्दगी तीरगी में, क्या होगा हासिल,
अपने घर को रौशन करे, वो आफताब न हो सका
एक रद्दी चीज़ कोई, जैसे किसी घर की,
सड़क पर पड़ा संग, दुरे नायाब न हो सका
माना के ये वक़्त, बच्चों की मस्ती का,
बिना तालीम के कोई, कामयाब न हो सका
आज भी बरहनगी, देखी तंग गलियों में,
बदन ढकने का पूरा, खवाब न हो सका
मेरे मुल्क की तरक्की में, कई परेशानियां "रत्ती"
तालीम का बड़ा दायरा, दस्तयाब न हो सका
शब्दार्थ:
एहतसाब = प्रजा की रक्षा के लिये व्यवस्था करना, हयात = जीवन
दुशवारियाँ = कठिनाईयाँ, तीरगी = अन्धकार, आफ़ताब = सूर्य, संग = पत्थर
दुरे नायाब = अमूल्य मोती, तालीम = शिक्षा, बरहनगी = नग्नता,दस्तयाब = प्राप्त
Wednesday, May 6, 2009
इंतज़ार है
इंतज़ार है
चान्दनी ख़ुबसूरत, गले मोतियों का हार है
सज-धज के निकली, नयी-नयी बहार है
चमके माथे की बिंदिया, झूमें कानों के झुमके,
चेहरा भी खिला-खिला, सुन्दर सिंगार है
महक रहा है तन-बदन, नाज़ का निशाँ नहीं,
रोम-रोम से बरस रहा, प्यार ही प्यार है
दिल चीज़ है ऐसी, मचलने लगा वो,
तुम्हारे लिये, तेरे वास्ते, ये बेक़रार है,
हर तरफ हरियाली, लहराते बाग़ भी,
ये सबा, ये फज़ां, लगे ख़ुश-गवार है,
तेरा दिदार, हर लम्हा मिलता रहे,
"रत्ती" ऐसे वक़्त का, मुझे इंतज़ार है
Monday, May 4, 2009
अधमरा
मैं वो गुल हूँ
जो खिला भी और नहीं भी
ज़िन्दा भी और नहीं भी
जो भी आया
नोचनेंवाला, मरोड़नेवाला,
दिन-रात ज़हर घोलनेवाला,
दरियादिल, नेकदिल
इंसान मिला भी और नहीं भी
उसनें क़सम खायी
सितम ढाने की, मुझे डुबाने की
बहुत कोशिशें की, जिंदा लाश बनाने की
ख़ुदा का शुक्र है, कुछ हद तक
मैं मरा भी और नहीं भी
वादे ढेरों वादे
देखते-देखते, सुनते-सुनते
सपनो के जाल, बुनते-बुनते
वादा फक़त वादा ही रहा,
सपना पूरा हुआ भी और नहीं भी
तन्हा दिल बोल उठा
तन्हाई में मजबूरियों से
किया सलाह-मशविरा, बढ़ती दूरियों से
रातभर करवटें, मैं बदलता रहा
रतजगा सोया भी और नहीं भी
सब दिन ख़ौफ भरे
निवाला छिनने का डर
सहमा ही रहा ज़िन्दगी भर
गुमशुदा हिम्म्त की तलाश में,
बेदम "रत्ती" ज़मीं पे गिरा भी और नहीं भी
चुनाव

मुँह उठाये फिर चले आये,
पुराने वादे न दोहराओ,
भाजप, कांग्रेस, समाजवादी,
सुस्त क़ानून व्यवस्था हमारी,
फेल हो तुम चौथा दर्जा,
कौन सुखी है बोलो आज,
Sunday, April 26, 2009
चराग़

अपनी ज़िन्दगी की परवाह नहीं,
गै़रों को दोस्ती के पैग़ाम दिये,
शीशा-ए-दिल को खिलौना समझा,
हल्की सी चोट से टूट जाता है
किस मिट्टी का बना है संगदिल,
ख़ुद रोता नहीं मुझे रूलाता है
अजीब इत्तेफाक है मैं भूल भी जाऊँ,
"रत्ती" वो हर शब सपनों में आता है
Wednesday, March 11, 2009
होली

होली
अब तो मोहन तुम बिन, कुछ नहीं सुहाता,
होली ही नहीं कोई, उत्सव नहीं भाता,
आतंकी ख़ून की होली, रोज़ ही खेलें,
बेगुनाह लोगों की, जां ही ले लें,
सरकार मूक होकर, तमाशा देखती है,
हत्याओं पर लगाम लगे, ये न सोचती है,
बिगड़ा रईस अबला के साथ, होली मनाता है,
गंगा मैली होती रोज़, कोई न बचता है,
अब जीवन के सारे रंग, फिके लगते हैं,
नंगा बचपन, अंधी जवानी, लाचार बुढापा सिसकते हैं,
होली तो एक बहाना है, बस गुण्डा-गर्दी फैलाना है,
वासना है दिलों में, मक़सद भूख मिटाना है,
प्यार के लाल रंग, लुप्त होते जा रहे हैं,
शत्रुता के काले रंग ही, नज़र आ रहे हैं,
मोहन तुम्हारे संग, होली खेलना चाहता हूँ,
भक्ती और श्रद्धा के रंग में, डूबना चाहता हूँ,
पिचकारी में कृपा द्दृष्टी के , रंग भर के डारो,
"रत्ती" भक्ती का पक्का रंग, मुझ पे डारो
Wednesday, February 25, 2009
परिचित
एक ढून्ढो हज़ार मिलते हैं,
दिल तोड़नें वाले सब यार मिलते हैं,
जानें क्या सुकून मिलता है उनको,
बड़े नसीब से वफादार मिलते हैं,
हमारा बोलना, हंसना, कुछ भी गवारा नहीं,
जानें किस मकसद से, मेरे पीछे चलते हैं,
बैर ही बसता है बस उनके दिलों में
मोहबत के अफसानें होठों पे लिये रहते हैं,
और पूछते हैं मिज़ाज, रोज़ ही हमसे,
सारे भेद लेके ही मेरे घर से निकलते हैं,
उनसे नज़रें चुराना, आदत सी बन गयी है,
कैसा इत्तेफाक़ है, वो हर मोड़ पे मिलते हैं,
माना के काँटे भी होते हैं, फूलों के चमन में,
"रत्ती" मासूम हो पतझड़ में कहाँ फूल खिलते हैं
Wednesday, January 28, 2009
आओ न

आना है तो आओ न,
Tuesday, January 27, 2009
शहीद


Thursday, January 1, 2009
नववर्ष

नये साल का स्वागत, पुरानें को भूल जायें,
अच्छी हों सच्ची हों, सबकी भावनायें,
नये साल की चुनोतियाँ , सवाल पूछेंगी,
पथरीली राहों में फूलों की, कामना ठीक नहीं,
भ्रष्टाचार , आतंकवाद, दानव बडे-बडे,
सहनशीलता , संयम के , हथियार पास हमारे,
समयचक्र का पहिया, तेज़ दौड़नें वाला,
दोस्ती
तपते सेहरा को बरखा, ठण्डी बहार चाहिये,
हमको जहाँ की दौलत नहीं, आपका प्यार चाहिये
लुका-छिपी खेलने का, बहाना नहीं चलेगा,
इन आंखों को हरपल, आपका दीदार चाहिये
हमें मन्ज़ूर है कांटों से, दोस्ती भी दुश्मनी भी,
दिल आपका नाज़ूक फूल, वो खुशबूदार चाहिये
रंज के ही सबब से, राबते बिखरे सभी,
रिश्तों में मज़बूती, और ऐतबार चाहिये
बदचलन न हों कभी, वादे-इरादे किसी के,
गुफ्तगू होती रहे, दोतरफा इज़हार चाहिये
ख़ुश्क चेहरे मायूसी को, देते रहेंगे दावत,
हल्की सी मुस्कान, मीठा सा ख़ुमार चाहिये
मेहबूब की यादों का, ज़िक्र होता रहे सदा,
लगे इबादत कर ली, रूबरू परवरदिगार चाहिये
मज़मून तो बस एक, मोहब्बत का पैग़ाम,
बनी रहे दोस्ती "रत्ती", हमसफर यार चाहिये
Monday, December 1, 2008
बेचारा मदन

बेचारा मदन
इस ढलते जीवन की सांझ की बेला में,
इश्वर कृपा के सहारे बैठा,
मदन कभी गगन तो, कभी धरा को ताकता,
खोपडी में धसी लखों चिन्ताओं की गोलियाँ,
झरने की भाँती गिरते आँसू, अस्वस्थ जर जर शरीर,
साहस की कमी खलती है,
ग़रीबी के श्राप से पीड़ित, सुख-सुविधाओं से वंचित,
फटी झोली में सुनहरे कल की आशा
और वर्तमान के शीशे पर,
धूल ही धूल .....सब कुछ फीका .....
धुन्धला .....
और निराश ख़ुद से बातें करता बड़बड़ाता मदन,
मेरे जो आंसू बहे उनकी गिनती नहीं,
हर त्रासदी को झेलता जीवन ख़तरे में,
न कम होनेवाली लाइलाज पीड़ा,
प्रश्नों के उधेड़बुन में फंसा,
किसी अपराधी की भांति, सख्त दंडात्मक करवाई का शिकार,
शरीर की दशा बहुत कुछ कहती है,
फांके ही फांके, अन्न के दाने मोतियों से भी महंगे लगते,
रूक-रूक के आवागमन करते श्वास,
गले से निकली आवाज़ कर्कश हो चली,
फटी बांसुरी की तरह,
आखों के गड्ढों में सुखी पुतलियाँ,
जैसे दीये में तेल की कमी,
शरीर हड्डीयों का ढांचा, कंकाल को ढोने में असमर्थ,
चेहरे की अनगिनत झुर्रियों को देखो,
मकड़ी का जाल,
क्या मैं बच पाऊंगा ?
भविष्य में होनेवाली घटनाओं का आभास हो रहा है,
मैं जब कभी भूले से नदिया किनारेवाले,
मरघट के पास से गुज़रता हूँ,
मुझे देख के वो पुकारता है,
हंसता है, मुझे चिढ़ाता है,
इशारे से बुलाता है कभी-कभी,
मदन आ जाओ, मदन आ जाओ,
तुम्हारी सारी चिन्ताओं का समाधान मेरे पास है,
आओ मेरी आगोश में समा जाओ,
मदन ..... नहीं ..... नहीं .....मेरे बच्चे .....
मेरी पत्नी ..... मेरा परिवार .....मेरा घर .....
मेरे खेत ..... नहीं ..... नहीं ..... नहीं .....
Monday, November 24, 2008
याद रहा

मैं ग़म में सब भूल गया था,
वो शम्मां रातभर जलती रही,
गै़रों की ज़ुबां से तल्ख़ फूल गिरे,
क्या दुआओं में असर है बाकी,
मयकशी ही एक दवा थी मेरी,
सुखे लब लिये मैख़ाने पहुंचा,
सब बलाओं से है शिकवा मेरा,
वादा करना और न निभाना,
"रत्ती" सीने की तह में दर्द भरे थे,
Friday, November 14, 2008
उपरवाला

तेरा ही अक्स है, तेरी ही खुशबू है सब में,
हर वक़्त हर शै में, हरकत जो हो रही,
इन नज़रों से न देखा, पर दिलों में बसता है,
अमीर-ग़रीब के फासले, मेरी समझ से परे,
कहीं ज़लज़ले आ रहे, कहीं बंजर ज़मीं,
वो सरमायादार सबका, मालामाल करेगा तुझे भी,
Wednesday, November 12, 2008
ओबामा
