Wednesday, July 13, 2016

मेरा घर

मेरा घर 


कैसी-कैसी मसायलों वाला मेरा घर है।  
नये उजले दिल में इक खौफ है डर है।। 


लोग बगल में चिंगारी लिये फिरते हैं,
ऐसे शरीफ लोगों से घिरा मेरा घर है।  


दर्द-ए-दिल की परतें खोलूँ किसके सामने,
रूह पे बड़ा बोझ है, डरावना खंडहर है।  


प्यार का जवाब प्यार से नहीं मिलता, 
चार सू फैली इक, अजीब सी लहर है।


दमे आखिर तलक, देखे ग़मों के साये,
ये ज़िन्दगी 'रत्ती", काँटों भरी डगर है।     

Thursday, April 14, 2016

राम ही सर्वत्र है

राम ही सर्वत्र है               



राम इत राम उत
राम ही सर्वत्र है 
ये बात जान ले 
पल्ले बांध ले 
मान ले 


राम ही हर साँस में 
रोम-रोम में 
ध्यान कर ले 
ठान ले 


जग बिच घोर अँधेरा 
मन को टटोल 
अंतर पट खोल  
मान ले


संत की संगत में 
बहती प्रेम धरा 
धोवे पाप सारा 
ज्ञान ले

निज मन पे काबू 
"रत्ती" कर सीख 
न मांग भीख 
जान ले 




Wednesday, March 30, 2016

आरज़ू कहाँ जाये

आरज़ू कहाँ जाये


आरज़ू बन-ठन के निकली घर से                 
ठंडी हवाओं के लम्स ने
मदहोश किया 
कारवां रुकवा दिया 
रात रंगीनियों में जवां 
बिखरी हुई 
सुब्ह को मिलेंगे गर्म 
उबलते ताने-बने 
दिल झकझोरते अफ़साने 
उस चौराहे पे अंजान 
कड़कड़ाती धूप तले 
तलवे जलते रहे 
तपिश जिस्म में फैल गयी 
निढाल ज़िन्दगी तकती रह गयी 
जहाँ दिलासा भी गुमशुदा हो 
तो "रत्ती" आरज़ू कहाँ जाये .......

Friday, March 4, 2016

नासमझ


नासमझ             


कहने को मासूम हैं पत्थर फेंकते हैं ।  
अपनी ही नज़र से जहाँ को देखते हैं ।। 

अभी-अभी सुबह का आग़ाज़ हुआ है, 
आते ही नुक्ताचीनी नज़रें तरेरते हैं । 

जो भी काफिला चला शामिल हो लिये,
नासमझ मुल्क की धज्जियां उधेड़ते हैं।  

माजरा क्या, अफ़साना क्या मालूम नहीं, 
लोगों के जज़्बातों से रोज़ खेलते है।

हर शै के सौदागरों की कतार है लम्बी,
इज़्ज़त, शौहरत, मज़हब, इमां बेचते हैं।

सियासी जमातों के मतलब सब टेढ़े,
मौका मिलते ही रोटियां सेकते हैं। 

जवानों की क़ुर्बानियों का मान रखते, 
जो अपने सीने पे गोलियां झेलते हैं। 

अब तो खौफ़ के भी पर कुतर डाले,
हम बेबस "रत्ती" आस्मां को देखते हैं।


Tuesday, March 1, 2016

जलते नारे

जलते नारे 


अपना ही घर उजाड़ दिया, सरफिरे आवारों ने,
आग लगा दी चार-सू, गलियों में चौबारों में । 

किसी के घर का चराग़ बुझा, किसी के सर ज़ख्म लगा, 
अब के बहुत आग देखी, आरक्षण के जलते नारों में । 

आतंकी सारे घर में थे, लूटपाट के सफर में थे, 
आगजनी-राख पसरी थी, तड़पती लाशें अंगारों में । 

दुकानें, स्कूल बने शमशान, स्वाह हुआ सारा सामान,
हैवानों की अकल जानवरों सी, नाम गुनहगारों में ।   

तुमने ग़रीबी के बीज बोये, आनेवाली नस्लें पाप ढोयें, 
भीख मंगाते एकदिन "रत्ती", नज़र आओगे कतारों में ।           

Wednesday, February 10, 2016

वो सिर्फ रुलायेगा

वो सिर्फ रुलायेगा      


अगर कोई न आया तो ग़म तो आयेगा 
धीरे-धीरे वक़्त-बेवक़्त जी को जलायेगा 


प्यार से ये दिन कट जाये तो अच्छा है
ज़माना भी बेरहम है आईना दिखायेगा 


तुम सांस लो या न लो किसी को परवाह नहीं है 
मौका मिलते ही वो सर पे चढ़ जायेगा 


उसकी नज़र में वफ़ा की कीमत सिफर ही है 
जिसके पास सिक्के होंगे उसे गले लगायेगा 


इधर बहुत सी उलझनें और पेच खड़े हैं
देखना नज़रअंदाज़ करके वो चला जायेगा 


अजी छोड़िये प्यार मोहोब्बत की बातें सारी 
जहाँ ढेरों बुलबुले हों रिश्ता टूट ही जायेगा 


इक नया पैग़ाम है सुनायेंगे नवाब साहब
मैं खूब जानता हूँ "रत्ती" वो सिर्फ रुलायेगा  



Tuesday, February 9, 2016

मेरे वास्ते

मेरे वास्ते
 

शब खामोशियाँ अोढ़े 
फिर निकली 
सुब्ह चीखती हुई 
आ धमकी 
दिन दहाड़ता खौफ़ लिये 
दस्तक दे रहा 
शाम ग़मों से लिपटी 
सिसकने लगी 
कहीं कोई पल है मेरे वास्ते 
जो निजात दिलाएगा 
सुकून की तरफ ले जायेगा ....... 


Wednesday, January 13, 2016

ऐ हमसफ़र

 हमसफ़र                  


ये करम है, तोहफा है या रुसवाई 
आन बसी दिल में अब तन्हाई 

जीने का सबब भी बदल गया है 
साथी साथ चलने की क़समें खाई

तीरगी से पहले दिल की दीवारों पे
कभी  प्यार की शम्मा थी जलाई 

ऐसी खफगी,  खुशामदें देखीं कहीं 
मसला है कौन करेगा तेरी रहनुमाई

ले  चल फिर उसी मोड़ पे मुझे 
ख़ुशबू चमन की नसों में थी समायी 

बीते पलों को शौक से पाला "रत्ती"
 हमसफ़र जब-जब तेरी याद आई 




Thursday, December 3, 2015

दिल दुखाते रहे

दिल दुखाते रहे



उस हसीं रात के जलवे याद आते रहे 
हम सिसक-सिसक के अश्क़ बहाते रहे 


बरगद पे परिन्दे चहकते संदेस देते  
ज़रा आँख बंद होती वो जगाते रहे


सरपट दौड़ना बचपन में रास आता था 
अब ख्वाबों में सब लोग  नचाते रहे 


अब तलक कई मंज़र देख चुके हैं 
सुकून भरे कम बाकी दिल दुखाते रहे 


दर्द के दरिया भी बहते देखे "रत्ती"
किरनों की दस्तक के साथ नहलाते रहे  




Wednesday, August 26, 2015

जुड़वा भाई

जुड़वा भाई 

कभी दो भाई ऐसे देखें हैं 
जो पास होकर भी दूर हैं 
पहला बाहर वाला 
हर वक़्त दुनियां के सामान 
ऐशो-आराम में खोकर
ज़हन में कूड़ा भरता गया  
दूजा अंदर वाला 
उसे देख जलता गया 
वो नज़ारा था, वो  वहम था, जो देखा था 
क्या था उसमें  
सुख-दुःख, दर्द-ग़म थे 
जाम की तरह सीने में उतार लिये 
नज़ारे देख-देख के सोचने को मजबूर ज़हन 
तो बावरा हो गया, ग़ुलाम हो गया 
सुनता है उसकी सारी 
बेतुकी जली-कटी बातें 
कौन उसे यह सब सिखाता है?
बताता है, समझाता है 
वो जलता है, जलाता है
खुद ही सुलगता है और 
अपने अंदर की दुनिया को भी जलाता है 
ये आँख और कान 
पल-पल की खबर देते रहते हैं दुनियां की 
क्या ये दुश्मन हैं हमारे ?
सच पूछिये तो हैं भी और नहीं भी 
सबब तो एक है 
देखने का नज़रिया ग़लत है,
सोच को जंग लगा है 
दिल के आईने पे धूल है 
ज़हन खुश्क़ है 
अहसास तो कीजिये, 
भूले से कभी अंदर झांक लीजिये 
कौन लड़ा रहा है दुनियां,
कौन तुम्हारा दुश्मन है ?
और एक बात अजीबो-ग़रीब
अलग होते हुए भी 
अंदर की दुनियां की 
बाहर की दुनियां से बात-चीत
मुसलसल करती रहती है 
खुद ही पीड़ित और खुद ही जज
फैसले ले लेती है
ये हक़ किसने दिया
खून जलाने  का ?
ये दो सगे भाई
बाहर की दुनियां और अंदर की दुनियां 
दोनों ग़ुलाम, एक ही राह पर चल रहे हैं 
लेकिन अंदर वाला ज़्यादा बुरा है 
जो जोड़-तोड़ में मसरूफ़ 
मुझे उसपे गुस्सा भी आता है 
फिर भी उसे पाल रहा हूँ 
मेरा नुक्सान हो रहा है
बताओ मैं क्या करूँ ?
 
 

Wednesday, August 19, 2015

हक़

हक़ 

कुदरत तूने जो किया, तेरा पूरा हक़ है 
मगर बन्दे सबको तेरी, सोच पे शक है 

तू जाग के भी सोता रहा रात-दिन 
अब वक़्त है सड़ती लाशों को गिन 
राहत की बातें खालिस बक-बक है 

शिवाले की मूर्ति ने जो नज़ारा देखा
क्या सही होगी इससे हाथों की रेखा 
जिनको दौलत मिली उनका लक है

खुदा के वास्ते कुदरत से न खेलो 
वो जो भी  देता  है प्रेम से ले लो 
"रत्ती" जो तेरी जेब में उतना तेरा हक़ है 

 

Tuesday, April 28, 2015

परिवार

परिवार 


उन लहरों का मचलना, मिलन करें किनारों से
ये ज़िन्दगी भी पनपती, खिलती है परिवारों से
 

इन रिवाज़ों के भवंर का, कुछ तो होता है असर 
दे सदा आबाद कुनबे, ऊँचे बड़े मीनारों से 
 

नाते-रिश्तों की ज़ंजीरें, मज़बूत हैं फौलाद सी 
महक उठती प्यार की, दिल के गलियारों से 
 

वक़्त की दुश्वारियां, लेती रहेंगी इम्तेहान
खानदान महफूज़ "रत्ती", बचाये गुनहगारों से 

Saturday, April 25, 2015

तीन घंटे का पर्चा

तीन घंटे का पर्चा 

चंद सांसों का खेल 
कुछ कल थीं, कुछ आज हैं, 
कुछ कल आयेंगी 
ये सांसें एक नज़राना हैं 
जिसका हम हर दिन लुत्फ़ उठा रहे हैं 
हर सुबह के साथ नयी 
दास्तां लिखते रहे
हयात की जानिब से 
काँटों को ढोने  के सिवा 
कुछ न हुआ हासिल 
आज कुछ लम्हों ने 
थोड़ी देर को हंसाया 
और दूजे पल एक सानिहा 
दर्द मुंह में दबाये आ धमका 
ग़मज़दा दर्दों की 
तिरछी नज़र के शिकार से 
ज़ख्म हरे भरे 
नासूर बनते रहे 
फिर इल्ज़ामात का सिलसिला 
हक़ीक़त कम और झूठ ज़ियादा 
इतना ही नहीं
नाउम्मीदी की दस्तक 
फिर सिफर को  रु-ब-रु पाया 
एकाएक खुदा याद आया
एक बशर की कीमत 
सिफर से भी कम आंकनेवाले
ज़माने के लोग, उनके अपने क़ायदे क़ानून 
इरादे, वायदे 
बेहद चौंकानेवाले, डरानेवाले 
एक अंदर की दुनियां 
उस दुनियां के अपने सपने 
और सपने कभी सबके साज़गार नहीं होते 
उनको साकार करने की कुव्वत नहीं 
और भूख की कमी है 
और ऐसे जीनेवालों का इलाज तो 
खुदा के पास भी नहीं 
ख़ैर  लुढ़कते, गिरते, चलते 
अश्क़, बहाते ,सुखाते 
दमे आखिर की दहलीज़ पर 
चार सू देखा 
अलविदा कहने के सिवा वक़्त ही कहाँ हैं
न सजदे में हाथ उठाये, न झुके 
जहाँ खड़े थे वहीँ टिके रहे
ये हयात का तीन घंटे का इम्तहान था 
जिसमे एक इंसान था 
जिसने अपने आवारा दिल की सुनके 
सिर्फ अपनी ज़िन्दगी जी 
तोषे का ख्याल न किया 
सरमाया बटोरते रहे 
खुशियाँ नहीं बांटी 
दर्दों को दावत दी 
इस खुली किताब में 
कुछ पन्ने सियाह हैं 
कुछ लहू से लिखे हैं 
खुद के खरीदे गुनाहों की फेहरिस्त लम्बी है 
उसका हिसाब-किताब, लेख-जोखा 
उसकी अदालत में होगा 
फिर एक दिन सांसों ने कहा 
इस जिस्म में घुटन होती है 
अब नहीं आयेंगे, हमें जाना होगा
उनके जाते ही परचा पूरा हो गया 
अधूरे खाब तकते रह गये 
सवाब और गुनाह बिना बताये 
रूह के साथ चल दिये…। 

Thursday, February 26, 2015

गीत न. ३

गीत न. ३
लहरों के सीने पे वो कुछ लिख आया
धुंधला था संदेसा कोई समझ न पाया
आहों की गली से सांसें गुज़रती हैं
हौले-हौले कदम आगे धरती हैं
अपने घर में जैसे कोई हो पराया
इन सुर्ख नज़रों से लहू न सूखे
पल हंसी के चुराये सपने भी लूटे
जी भर के कोसा और खूब रुलाया
अब गर्दिश में तारों की बदसुलूकी
बची थी जो इक आस वो भी टूटी
"रत्ती" खौफ-ज़दा रूह को तड़पाया

Wednesday, February 11, 2015

जीने की आदत

जीने की आदत
बिन पिये ही जीने की आदत बना ले
अपने रूठे-टूटे दिल को तू मना ले
मरकज़ मन्ज़िल का देख दिन-रात
उस बिखरी हुई सोच को जमा ले
 
ये ज़िन्दगी कश के सिवा कुछ और भी है
अगर उड़ाना है तो अपने ग़मों को उड़ा ले
 
उनको बर्बादियों के ताने-बाने बुनने दे
तू संगदिलों में अपनी जगह बना ले
 
बेशक हर बात का कुछ तो सबब होता है
जैसे हालात हों उनको वैसा सजा ले
 
 
कोई रात अंधेरों को मिटा नहीं सकती
पुकार सुबह के उजालों को बुला ले
 
पल-पल की खबर धड़कनों को बढ़ाये
उखड़ी हुई साँसों को गले लगा ले
 
कोई मुतमइन नज़र न आया जहाँ में
कोशिश से "रत्ती" मसलों पे निजात पा ले
 
शब्दार्थ
मरकज़ = केंद्र, संगदिल = पत्थर दिल,
सबब = कारण, मुतमइन = संतुष्ट

Tuesday, January 27, 2015

मन की आवाज़


मन की आवाज़
अच्छे सपनों को परवाज़ दीजिये
जो काम सोचा उसे पूरा कीजिये
कोई तुम्हारा नसीब नहीं बदल सकता
खुद कुआँ खोद के पानी पीजिये
ये शब के तारे कुछ पल ही चमकेंगे
ये अब्र भी थोड़ी देर को बरसेंगे
अपने हौसलों को ज़िंदा कीजिये
 
 
मुहोब्बत के साये में धोखा पाओगे
जो पास है तुम्हारे वो भी गवांओगे
घर से निकलो न इंतज़ार कीजिये
वफ़ा, जज़्बात की क़दर कोई न जाने
ज़माना ये ख़ल्क़त किसी की न माने
कभी "रत्ती" मन की भी सुन लीजिये
  

Thursday, January 22, 2015

सियासी लीडर

सियासी लीडर
 
क्या लीडर सच्चा होता है, अपनी अवाम का ।
या फिर भूखा दौलत का, नहीं किसी काम का ।। 
 
 
नक़ाब-पे-नक़ाब ओढ़ के, निकले अपने घर से,
बखूबी रोल अदा करे वो, शातिर बेईमान का ।
 
 
उनकी सियासी चालों से, हम तो नहीं वाक़िफ़,
खामोशियों में था इशारा, लोगों के क़त्लेआम का ।
 
 
 
मेरे ज़हन में बसी हैं, कई उलझनें उलझी,
मुझे भरोसा अपने खुदा, वाहेगुरु, प्यारे राम का । 
 
 
 
माना के सियासत में तो, सब होता है जायज़,
हर तबके की हिफाज़त, भरोसा दो जान का ।
 
 
ज़िन्दगी मुड़-मुड़ के "रत्ती", ले इम्तिहां हमारा,
क्या कोई दर बचा है, मोहब्बत का, ईमान का ।

Monday, January 19, 2015

अच्छे दिन

अच्छे दिन
अच्छे दिनों के सपने सब देखते हैं
अभी कल ही नेताजी ने कुछ सपने दिखाये
विकास दर गगन को छुआ दी
उन्नती की गाड़ी खड़ी है कहीं गैराज में
उसके टायरों में से
आशा की हवा भी निकल दी
बुरे दिनों ने काला चोला पहन के
अच्छे दिनों को अगवा कर लिया है
जीवन को तहस-नहस करके दबा दिया है
अश्रुओं की नमकीन धारा बढ़ायी
महंगाई, भ्रष्टाचार बड़े ठग
निकले बड़े आततायी
एक शीशा कहीं कोने में खड़ा
दिखा रहा है चहरे की रंगत
जवानी में झुर्रियां हैं या झुर्रियों में जवानी
नशे का शिकार युवा,
बेसुध क्या जाने - अच्छे दिन
अच्छे दिन किसी मदारी के बन्दर हैं
मनचाहा नाच नचाओ
हिचकोले खाते हुए कमर मटकाओ
मदारी के पास बढ़िया चाबुक है
बन्दर की पीठ पे जब-तब जड़ता है
गले में फाँस है बेचारा
दर्द से कहराता है, दांत भींच के डरता है
संसद में सफेद पोशों की भीड़ ने
पैंसठ सालों से बेहिसाब
सारा माल-टाल खाया
दाद देनी पड़ेगी, एक भी डकार न आया
भाई मेरे,
अच्छे दिन तो नेताओं के आये
भारतवासी बाबाजी का ठुल्लू पाये
अच्छे दिन अख़बारों में,
मिडिया में देखे सुने
सच तो ये है अच्छे दिन लोगों के
ज़हन में रहते हैं, रहेंगे, सारी उमर
अपराधी बन कर
काश के अच्छे दिनों के बीज मिलते
खेती करके उपजे दानों को
सारे विश्व में बांटता .....
 

Thursday, December 25, 2014

कटी पतंग

कटी पतंग
बचपन पतंगों की बहार सा
लाड, प्यार, दुलार सा
हुड़दंग, शरारत, मस्ती
नन्हे होंठों पे मुस्कान हस्ती
कौन आया कौन गया
क्या खाया क्या पकाया
क्या टुटा क्या फूटा
न चोट का डर, न दर्द की खबर
फिर आया
जवानी का अनोखा व्यव्हार
बात-बात पे गुस्सा प्रतिकार
खिलने लगे तन के बंध
रोज़ तू-तू मैं-मैं होती जंग
सजगता में भी थे मदहोश
जवानी में गुम था होश
चारों और संघर्ष के मेले
हमने भी खूब खेल खेले
किसी को लूटा, किसी को डुबाया
उसके रोने पे बड़ा मज़ा आया
फिर दस्तक दी
वक़्त का पहिया ले आया
चिरपरिचित अंदाज़ में बुढ़ापे से मिलाया
मैंने अनुभवों से कुछ सीखा था
वही बार-बार दोहराया
जीवन नैया डगमगाती रुकी किनारे
वहां अतीत के फूल थे, भविष्य के अंगारे
पग धरूँ तो किस जगह
सब कहते तुम नहीं हो हमारे
कटी पतंग क्या करे
नहीं उड़ने की क्षमता
भिक्षा मांगने की मेरी नहीं मंशा
मैं तार-तार कटी पतंग सही
बस स्वतंत्रता चाहूँ
प्रारभ्ध की हवा जहाँ ले चले वही जाऊं
आओ, आओ निकट आओ
टूटी डोर बची है ले जाओ …
टूटी डोर बची है ले जाओ …
 

Thursday, December 18, 2014

ग़ज़ल - १४

ग़ज़ल - १४
याद उसकी बड़ी सुहानी थी।
बस मेरे पास इक निशानी थी।।
रात भर जाग के गिने तारे,
सुबह तक साँस भी बचानी थी।
प्यार की मार भी अनोखी है,
और हमको किमत चुकानी थी।
बंद देखा हरेक दरवाज़ा,
उनको हमसे नज़र चुरानी थी।
हो मिलनसार तो बहुत अच्छा,
फिर मुहब्बत फकत निभानी थी।
जल गयी फिर बुझी अखियाँ जो,
प्यास दिन रात ही बुझानी थी।
साफ "रत्ती" नहीं शीशा दिल का,
इल्म की आग ही जलनी थी।