Tuesday, July 1, 2008

प्रकृति


प्रकृति

प्रकृति तुम्हारा स्वरुप, तुम्हरी सुंदरता पर,

सारा जग मोहित हो जाता है, प्रसन्न हो जाता है,

तुमने हरियाली का परचम बखूबी लहराया,

विश्व के हर कोने में, लेकिन कोई भी देश,

तुमसे प्यार करता हो, तुम्हें चाहता हो,

तुमसे मित्रता करना चाहता हो,

नहीं, कोई नहीं चाहता,

मित्रता का पाठ हमें विद्यालय में पढ़ाया गया था,

शायद हम उसे भूल गये हैं,

प्रकृति संपूर्ण मानव जति से नाराज़ है, दुखी है,

बादलों को देखिये वो आवारा हो चले हैं,

मनमानें ढंग से गरजते हैं, बरसते हैं,

खेत में जब फसलों को पानी चाहिये,

उस समय फसलें बिना पानी के ही दम तोड़ती हैं,

नतीजा अनाज का अभाव, गगन छूती कीमतें,

ढेर सारी समस्याओं का जन्म,

हम नित्य ही समाचार पत्रों में सुर्खियाँ पढ़ते हैं,

फलां-फलां देश में भूकंप आया,

किसी दूसरे देश में बाढ़ आ गयी,

जनमाल की भारी क्षति हो गयी,

इसका कारण क्या है हमनें सोचा ही नहीं,

समुद्रतल से तेल के भण्डार को,

डकैतों की भांति लूट लिया,

गगनचूम्बी इमारतों में कांक्रीट का जाल,

ऐसी परिस्थितीयों में समुद्र देवता कहाँ अपने पांव पसारे,

कारखानों की चिमनीयों से निकलता धुंआ,

वाहनों का धुंआ - ये किसकी देन है?

बिमारियों और संकटों को आमंत्रण किसने दिया?

प्रकृति और मानव के बीच बढती दूरी,

ये असंतुलन संपूर्ण मानव जाति का विनाश कर देगा,

प्रलय से बचनें का कोई मार्ग खोजना होगा,

प्रकृति कभी किसी के विरुद्ध अन्याय नहीं करती,

वह हमारे जीवन की रक्षा करती है,

हमारे सवास्थ्य को तंदुरुस्त रखने का सदा, प्रयत्न करती है,

लेकिन तुम सोचो मानव, निर्णय तो हो के रहेगा,

तुम दंड के भागी हो, दंड तो मिलेगा,

अवश्य मिलेगा और यही नहीं,

उसका मूल्य भी चुकाना होगा अपने प्राण देकर .....