Tuesday, February 9, 2016

मेरे वास्ते

मेरे वास्ते
 

शब खामोशियाँ अोढ़े 
फिर निकली 
सुब्ह चीखती हुई 
आ धमकी 
दिन दहाड़ता खौफ़ लिये 
दस्तक दे रहा 
शाम ग़मों से लिपटी 
सिसकने लगी 
कहीं कोई पल है मेरे वास्ते 
जो निजात दिलाएगा 
सुकून की तरफ ले जायेगा ....... 


Wednesday, January 13, 2016

ऐ हमसफ़र

 हमसफ़र                  


ये करम है, तोहफा है या रुसवाई 
आन बसी दिल में अब तन्हाई 

जीने का सबब भी बदल गया है 
साथी साथ चलने की क़समें खाई

तीरगी से पहले दिल की दीवारों पे
कभी  प्यार की शम्मा थी जलाई 

ऐसी खफगी,  खुशामदें देखीं कहीं 
मसला है कौन करेगा तेरी रहनुमाई

ले  चल फिर उसी मोड़ पे मुझे 
ख़ुशबू चमन की नसों में थी समायी 

बीते पलों को शौक से पाला "रत्ती"
 हमसफ़र जब-जब तेरी याद आई 




Thursday, December 3, 2015

दिल दुखाते रहे

दिल दुखाते रहे



उस हसीं रात के जलवे याद आते रहे 
हम सिसक-सिसक के अश्क़ बहाते रहे 


बरगद पे परिन्दे चहकते संदेस देते  
ज़रा आँख बंद होती वो जगाते रहे


सरपट दौड़ना बचपन में रास आता था 
अब ख्वाबों में सब लोग  नचाते रहे 


अब तलक कई मंज़र देख चुके हैं 
सुकून भरे कम बाकी दिल दुखाते रहे 


दर्द के दरिया भी बहते देखे "रत्ती"
किरनों की दस्तक के साथ नहलाते रहे  




Wednesday, August 26, 2015

जुड़वा भाई

जुड़वा भाई 

कभी दो भाई ऐसे देखें हैं 
जो पास होकर भी दूर हैं 
पहला बाहर वाला 
हर वक़्त दुनियां के सामान 
ऐशो-आराम में खोकर
ज़हन में कूड़ा भरता गया  
दूजा अंदर वाला 
उसे देख जलता गया 
वो नज़ारा था, वो  वहम था, जो देखा था 
क्या था उसमें  
सुख-दुःख, दर्द-ग़म थे 
जाम की तरह सीने में उतार लिये 
नज़ारे देख-देख के सोचने को मजबूर ज़हन 
तो बावरा हो गया, ग़ुलाम हो गया 
सुनता है उसकी सारी 
बेतुकी जली-कटी बातें 
कौन उसे यह सब सिखाता है?
बताता है, समझाता है 
वो जलता है, जलाता है
खुद ही सुलगता है और 
अपने अंदर की दुनिया को भी जलाता है 
ये आँख और कान 
पल-पल की खबर देते रहते हैं दुनियां की 
क्या ये दुश्मन हैं हमारे ?
सच पूछिये तो हैं भी और नहीं भी 
सबब तो एक है 
देखने का नज़रिया ग़लत है,
सोच को जंग लगा है 
दिल के आईने पे धूल है 
ज़हन खुश्क़ है 
अहसास तो कीजिये, 
भूले से कभी अंदर झांक लीजिये 
कौन लड़ा रहा है दुनियां,
कौन तुम्हारा दुश्मन है ?
और एक बात अजीबो-ग़रीब
अलग होते हुए भी 
अंदर की दुनियां की 
बाहर की दुनियां से बात-चीत
मुसलसल करती रहती है 
खुद ही पीड़ित और खुद ही जज
फैसले ले लेती है
ये हक़ किसने दिया
खून जलाने  का ?
ये दो सगे भाई
बाहर की दुनियां और अंदर की दुनियां 
दोनों ग़ुलाम, एक ही राह पर चल रहे हैं 
लेकिन अंदर वाला ज़्यादा बुरा है 
जो जोड़-तोड़ में मसरूफ़ 
मुझे उसपे गुस्सा भी आता है 
फिर भी उसे पाल रहा हूँ 
मेरा नुक्सान हो रहा है
बताओ मैं क्या करूँ ?
 
 

Wednesday, August 19, 2015

हक़

हक़ 

कुदरत तूने जो किया, तेरा पूरा हक़ है 
मगर बन्दे सबको तेरी, सोच पे शक है 

तू जाग के भी सोता रहा रात-दिन 
अब वक़्त है सड़ती लाशों को गिन 
राहत की बातें खालिस बक-बक है 

शिवाले की मूर्ति ने जो नज़ारा देखा
क्या सही होगी इससे हाथों की रेखा 
जिनको दौलत मिली उनका लक है

खुदा के वास्ते कुदरत से न खेलो 
वो जो भी  देता  है प्रेम से ले लो 
"रत्ती" जो तेरी जेब में उतना तेरा हक़ है 

 

Tuesday, April 28, 2015

परिवार

परिवार 


उन लहरों का मचलना, मिलन करें किनारों से
ये ज़िन्दगी भी पनपती, खिलती है परिवारों से
 

इन रिवाज़ों के भवंर का, कुछ तो होता है असर 
दे सदा आबाद कुनबे, ऊँचे बड़े मीनारों से 
 

नाते-रिश्तों की ज़ंजीरें, मज़बूत हैं फौलाद सी 
महक उठती प्यार की, दिल के गलियारों से 
 

वक़्त की दुश्वारियां, लेती रहेंगी इम्तेहान
खानदान महफूज़ "रत्ती", बचाये गुनहगारों से 

Saturday, April 25, 2015

तीन घंटे का पर्चा

तीन घंटे का पर्चा 

चंद सांसों का खेल 
कुछ कल थीं, कुछ आज हैं, 
कुछ कल आयेंगी 
ये सांसें एक नज़राना हैं 
जिसका हम हर दिन लुत्फ़ उठा रहे हैं 
हर सुबह के साथ नयी 
दास्तां लिखते रहे
हयात की जानिब से 
काँटों को ढोने  के सिवा 
कुछ न हुआ हासिल 
आज कुछ लम्हों ने 
थोड़ी देर को हंसाया 
और दूजे पल एक सानिहा 
दर्द मुंह में दबाये आ धमका 
ग़मज़दा दर्दों की 
तिरछी नज़र के शिकार से 
ज़ख्म हरे भरे 
नासूर बनते रहे 
फिर इल्ज़ामात का सिलसिला 
हक़ीक़त कम और झूठ ज़ियादा 
इतना ही नहीं
नाउम्मीदी की दस्तक 
फिर सिफर को  रु-ब-रु पाया 
एकाएक खुदा याद आया
एक बशर की कीमत 
सिफर से भी कम आंकनेवाले
ज़माने के लोग, उनके अपने क़ायदे क़ानून 
इरादे, वायदे 
बेहद चौंकानेवाले, डरानेवाले 
एक अंदर की दुनियां 
उस दुनियां के अपने सपने 
और सपने कभी सबके साज़गार नहीं होते 
उनको साकार करने की कुव्वत नहीं 
और भूख की कमी है 
और ऐसे जीनेवालों का इलाज तो 
खुदा के पास भी नहीं 
ख़ैर  लुढ़कते, गिरते, चलते 
अश्क़, बहाते ,सुखाते 
दमे आखिर की दहलीज़ पर 
चार सू देखा 
अलविदा कहने के सिवा वक़्त ही कहाँ हैं
न सजदे में हाथ उठाये, न झुके 
जहाँ खड़े थे वहीँ टिके रहे
ये हयात का तीन घंटे का इम्तहान था 
जिसमे एक इंसान था 
जिसने अपने आवारा दिल की सुनके 
सिर्फ अपनी ज़िन्दगी जी 
तोषे का ख्याल न किया 
सरमाया बटोरते रहे 
खुशियाँ नहीं बांटी 
दर्दों को दावत दी 
इस खुली किताब में 
कुछ पन्ने सियाह हैं 
कुछ लहू से लिखे हैं 
खुद के खरीदे गुनाहों की फेहरिस्त लम्बी है 
उसका हिसाब-किताब, लेख-जोखा 
उसकी अदालत में होगा 
फिर एक दिन सांसों ने कहा 
इस जिस्म में घुटन होती है 
अब नहीं आयेंगे, हमें जाना होगा
उनके जाते ही परचा पूरा हो गया 
अधूरे खाब तकते रह गये 
सवाब और गुनाह बिना बताये 
रूह के साथ चल दिये…।