Tuesday, November 8, 2016

आर्थिक सर्जीकल स्ट्राइक

आर्थिक सर्जीकल स्ट्राइक 


कालेधन पे सर्जीकल स्ट्राइक 
कालाधन कैसे होगा वाइट 
पांच सौ हज़ार हुए बंद 
भ्रष्टाचारियों को किया अपंग 
देशद्रोहियों का उड़ा रंग
आतंकियों की कटी पतंग 
चुनावी माहौल हुआ बदरंग 
जाली नोटों को लगा जंग 
लोभियों का मोहभंग 
मोदी सरकार हुई दबंग 
ये ऐतिहासिक कदम है राइट 
इकोनॉमी की बढ़ेगी हाइट 

दूरगामी अच्छे परिणाम 
बड़ा साहसिक है ये काम 
चोरों का जीना हुआ हराम 
भारत का होगा जग में नाम 
जेन्युइन लोग बड़े एक्साइट 
"रत्ती" देश का फ्यूचर ब्राइट 


Wednesday, July 13, 2016

मेरा घर

मेरा घर 


कैसी-कैसी मसायलों वाला मेरा घर है।  
नये उजले दिल में इक खौफ है डर है।। 


लोग बगल में चिंगारी लिये फिरते हैं,
ऐसे शरीफ लोगों से घिरा मेरा घर है।  


दर्द-ए-दिल की परतें खोलूँ किसके सामने,
रूह पे बड़ा बोझ है, डरावना खंडहर है।  


प्यार का जवाब प्यार से नहीं मिलता, 
चार सू फैली इक, अजीब सी लहर है।


दमे आखिर तलक, देखे ग़मों के साये,
ये ज़िन्दगी 'रत्ती", काँटों भरी डगर है।     

Thursday, April 14, 2016

राम ही सर्वत्र है

राम ही सर्वत्र है               



राम इत राम उत
राम ही सर्वत्र है 
ये बात जान ले 
पल्ले बांध ले 
मान ले 


राम ही हर साँस में 
रोम-रोम में 
ध्यान कर ले 
ठान ले 


जग बिच घोर अँधेरा 
मन को टटोल 
अंतर पट खोल  
मान ले


संत की संगत में 
बहती प्रेम धरा 
धोवे पाप सारा 
ज्ञान ले

निज मन पे काबू 
"रत्ती" कर सीख 
न मांग भीख 
जान ले 




Wednesday, March 30, 2016

आरज़ू कहाँ जाये

आरज़ू कहाँ जाये


आरज़ू बन-ठन के निकली घर से                 
ठंडी हवाओं के लम्स ने
मदहोश किया 
कारवां रुकवा दिया 
रात रंगीनियों में जवां 
बिखरी हुई 
सुब्ह को मिलेंगे गर्म 
उबलते ताने-बने 
दिल झकझोरते अफ़साने 
उस चौराहे पे अंजान 
कड़कड़ाती धूप तले 
तलवे जलते रहे 
तपिश जिस्म में फैल गयी 
निढाल ज़िन्दगी तकती रह गयी 
जहाँ दिलासा भी गुमशुदा हो 
तो "रत्ती" आरज़ू कहाँ जाये .......

Friday, March 4, 2016

नासमझ


नासमझ             


कहने को मासूम हैं पत्थर फेंकते हैं ।  
अपनी ही नज़र से जहाँ को देखते हैं ।। 

अभी-अभी सुबह का आग़ाज़ हुआ है, 
आते ही नुक्ताचीनी नज़रें तरेरते हैं । 

जो भी काफिला चला शामिल हो लिये,
नासमझ मुल्क की धज्जियां उधेड़ते हैं।  

माजरा क्या, अफ़साना क्या मालूम नहीं, 
लोगों के जज़्बातों से रोज़ खेलते है।

हर शै के सौदागरों की कतार है लम्बी,
इज़्ज़त, शौहरत, मज़हब, इमां बेचते हैं।

सियासी जमातों के मतलब सब टेढ़े,
मौका मिलते ही रोटियां सेकते हैं। 

जवानों की क़ुर्बानियों का मान रखते, 
जो अपने सीने पे गोलियां झेलते हैं। 

अब तो खौफ़ के भी पर कुतर डाले,
हम बेबस "रत्ती" आस्मां को देखते हैं।


Tuesday, March 1, 2016

जलते नारे

जलते नारे 


अपना ही घर उजाड़ दिया, सरफिरे आवारों ने,
आग लगा दी चार-सू, गलियों में चौबारों में । 

किसी के घर का चराग़ बुझा, किसी के सर ज़ख्म लगा, 
अब के बहुत आग देखी, आरक्षण के जलते नारों में । 

आतंकी सारे घर में थे, लूटपाट के सफर में थे, 
आगजनी-राख पसरी थी, तड़पती लाशें अंगारों में । 

दुकानें, स्कूल बने शमशान, स्वाह हुआ सारा सामान,
हैवानों की अकल जानवरों सी, नाम गुनहगारों में ।   

तुमने ग़रीबी के बीज बोये, आनेवाली नस्लें पाप ढोयें, 
भीख मंगाते एकदिन "रत्ती", नज़र आओगे कतारों में ।           

Wednesday, February 10, 2016

वो सिर्फ रुलायेगा

वो सिर्फ रुलायेगा      


अगर कोई न आया तो ग़म तो आयेगा 
धीरे-धीरे वक़्त-बेवक़्त जी को जलायेगा 


प्यार से ये दिन कट जाये तो अच्छा है
ज़माना भी बेरहम है आईना दिखायेगा 


तुम सांस लो या न लो किसी को परवाह नहीं है 
मौका मिलते ही वो सर पे चढ़ जायेगा 


उसकी नज़र में वफ़ा की कीमत सिफर ही है 
जिसके पास सिक्के होंगे उसे गले लगायेगा 


इधर बहुत सी उलझनें और पेच खड़े हैं
देखना नज़रअंदाज़ करके वो चला जायेगा 


अजी छोड़िये प्यार मोहोब्बत की बातें सारी 
जहाँ ढेरों बुलबुले हों रिश्ता टूट ही जायेगा 


इक नया पैग़ाम है सुनायेंगे नवाब साहब
मैं खूब जानता हूँ "रत्ती" वो सिर्फ रुलायेगा