Monday, September 22, 2014

गीत न. २

गीत न. २
 
जाने कब आता है, जाने कब जाता है।
निरमोहिया है वो, बहुत सताता है।।
 
समझ के भी रोज़-रोज़ नासमझी करे,
ऐसी हरकतों से होते दिल के घाव हरे ,
मीठी-मीठी बातों से उल्लू बनता है
 
नैनो की भाषा जाने इशारों को पहचाने,
खता पे खता करे बात कभी न माने ,
खुद हँसता रहता है मुझको रुलाता है
 
दूरियों के साये न हों आसपास कहीं ,
मंज़िल मेरी भी वही जो तूने चुनी ,
दो दिलों का संगम हो तो बड़ा मज़ा आता है
 
माना था उसे रहबर हरपल साथ देगा ,
मेरी तमन्नाओं का वो ख्याल रखेगा ,
"रत्ती" हरजाई बना जब से मेरा जी घबराता है

Thursday, September 11, 2014

मासूम ख़लक़त

मासूम ख़लक़त


ग़रज़ की मारी दुनियाँ हर कीमत अदा करती है।
मुसीबत के वक़्त ही खुदा को याद करती है ।।


यूँ तो तरकश में लाखों तीर सजा रक्खे हैं,
तलाश इक मौके की मिलते ही वार करती है। 


जज़्बात, वफ़ा, प्यार भी तो सारे हथियार हैं,
जाल बुनकर धोखे से सबका शिकार करती है।


ज़िन्दगी में चार सू तिज़ारत मिलेगी आपको,
मोहब्बत से कहाँ ये क़ायनात खुद चलती है। 


पीरों, फकीरों की रहनुमाई, प्यार सर आँखों पर,
लेकिन हर कूचे में ढोंगियों की दुकां खूब चलती है। 


कश्मकश में डूबा बशर कहाँ किसी दे दस्तक,
मासूम ख़लक़त "रत्ती" हर लम्हा मरती है। 
 

Friday, July 25, 2014

गीत - १

गीत - १
चल तू भी उसी डगर पे
जहाँ तेरी हो सुनवायी
दुःख के बदल सब छुप जायें
दिल कहे अब शांति पायी

आस के पैर नहीं अब टिकते
वो रहनुमां थे नहीं दिखते
कई बार एहसास हुआ ये
बेवजह उदासी छायी

ये समां भी महंगा इतना
समझाऊँ मैं उसको कितना
छोड़ दे मुझे अकेला
काहे तूने चोट लगायी

नज़रें लगीं ख़फा-ख़फा सी
हर बात कड़वी दवा सी
"रत्ती" थोड़ी मिठास भर दे
मन में ऐसी सोच न आयी

चल तू भी उसी डगर पे
जहाँ तेरी हो सुनवायी …..

Friday, February 28, 2014

ग़ज़ल - १३

ग़ज़ल - १३

 
बात झूठी भी खरी होने लगी।
वो कहावत अब सही होने लगी।।


रास्ते ये प्यार के, मंज़िल हसीं,
उनसे मुझको दिल्लगी होने लगी।

 
ख्वाहिशें उस चाँद की बढ़ने लगीं,
तू-तू मैं-मैं रोज़ ही होने लगी।
 
रात सारी गुफ़तगू में थी मगर,
सुब्ह चुप-चुप थी, दुखी होने लगी।

 
जगमगाये, झिलमिलाये ख़ाब जो,
चाहतें उनकी बड़ी होने लगी।

 
ज़ख्म खुद ही भर गये, देखा उसे,
आज हमको फिर ख़ुशी होने लगी।

 
है चरागों के बगल में रौशनी,
दूर सारी बेबसी होने लगी।

 
वो खुदा थे, रहनुमां भी, चल दिये,
उनके जाने से कमी होने लगी।


इश्क़ को तुम रोग "रत्ती" मान लो,
एक पल में आशिक़ी होने लगी।

Saturday, February 1, 2014

सियासत

सियासत 

खामोश रहने की हिदायत 
देते सब हालात 
कहा गिरवी रख छोड़े हमने 
अच्छे वो ख्यालात 

मन मुआफ़िक़ हर काम करें 
मतलब से करे वो बात 
हर बात धुएं में उड़ाते 
कब मिलेगी निजात 

आज़ादी की परवाज़ काश 
पहले सी फिर होती 
तार दिलों के जुड़े रहते 
प्यार से करते बात 

दिल के सफ़ेद पन्नो पर 
बिखरी काली सियाही 
दिखते नहीं दर्द किसी के 
ज़ख्मों पे करे आघात 

हम आज़ाद परिंदों के 
पर कुतर डाले 
सियासत खा गयी सबको 
बाद से बदतर हालात

महंगाई के ये जलज़ले 
रोज़ तोहफे में आते 
टुकड़े टुकड़े अवाम के 
बची न कोई जमात 

शिद्दत से उछले थे मुद्दे 
उम्मीद लिए अरमान से 
रहनुमाई करनेवाला पूछे 
सवालात पे सवालात 

अच्छी लगती नहीं ज़ंजीरें 
न पिंजरे के तोते हम 
ज़ुल्म न करो हम पे 
न मारो घुसे लात 

एक एक दर्द उसे बताया 
सुनी-अनसुनी हो गयी 
क़ुरबानी के बकरे की 
हयात काली रात 

आज़ादी बनी "रत्ती" का सपना 
शायद कोई मिले अपना 
आस की प्यास रहेगी मन में 
जाने कब होगी मुलाक़ात 





     

Saturday, January 18, 2014

आदमी

आदमी 

खुदा की नक़ल करने लगा है आदमी।
खुद को बड़ा समझने लगा है आदमी।। 

पैर हैं फलक पे उसके देखे न ज़मी पे।  
हर शख्स को छोटा कहने लगा है आदमी।।

जिसके शाने दबे हों ग़मों के बोझ तले।
उसे वक़्त से पहले मारने लगा है आदमी।।

मौत तो एक दफा ही दर्द देगी आख़िरे-दम।
हर लम्हा सबको दर्द देने लगा है आदमी।।

हयात-ए-शम्मां तो पिघलेगी एक दिन। 
मासूमों पे शोले बरसाने लगा है आदमी।। 

रुखसत होनेवाले कुछ न साथ ले जाते।
"रत्ती" दौलत जहाँ की बटोरने लगा है आदमी।।   
     

Tuesday, October 1, 2013

ग़ज़ल - १२

 
 ग़ज़ल - १२


कभी मशहूर था इक नाम था गुमनाम से पहले .
जिसे सर    पे बिठाते पूछते नाकाम से पहले



क़सक रह रह के तड़पती रही इस जान को दिन भर,
न आया संगदिल माही मेरा वो शाम से पहले



जली गहरी बुझी यादों से शिकवा न गिला कोई,
गुज़र ही जायेगी ये ज़िन्दगी फ़रज़ाम* से पहले



ख़ता जो हो गयी तो हो गयी बस में नहीं क्या ये ?
ज़रा तुम सोच लेते इक दफ़ा अंजाम से पहले



न मयखाना रहा ना महकती यादें सनम तेरी,
ज़रा लुत्फ़ मिलेगा हमको पूछो जाम से पहले



खुली पलकों तले ढूंढे ज़रा सी छाँव जब "रत्ती"
सितम ढाये ज़माने ने मगर हर काम से पहले



फ़रज़ाम = नतीजा, परिणाम, अंत

1222/1222/1222/1222