Wednesday, August 26, 2015

जुड़वा भाई

जुड़वा भाई 

कभी दो भाई ऐसे देखें हैं 
जो पास होकर भी दूर हैं 
पहला बाहर वाला 
हर वक़्त दुनियां के सामान 
ऐशो-आराम में खोकर
ज़हन में कूड़ा भरता गया  
दूजा अंदर वाला 
उसे देख जलता गया 
वो नज़ारा था, वो  वहम था, जो देखा था 
क्या था उसमें  
सुख-दुःख, दर्द-ग़म थे 
जाम की तरह सीने में उतार लिये 
नज़ारे देख-देख के सोचने को मजबूर ज़हन 
तो बावरा हो गया, ग़ुलाम हो गया 
सुनता है उसकी सारी 
बेतुकी जली-कटी बातें 
कौन उसे यह सब सिखाता है?
बताता है, समझाता है 
वो जलता है, जलाता है
खुद ही सुलगता है और 
अपने अंदर की दुनिया को भी जलाता है 
ये आँख और कान 
पल-पल की खबर देते रहते हैं दुनियां की 
क्या ये दुश्मन हैं हमारे ?
सच पूछिये तो हैं भी और नहीं भी 
सबब तो एक है 
देखने का नज़रिया ग़लत है,
सोच को जंग लगा है 
दिल के आईने पे धूल है 
ज़हन खुश्क़ है 
अहसास तो कीजिये, 
भूले से कभी अंदर झांक लीजिये 
कौन लड़ा रहा है दुनियां,
कौन तुम्हारा दुश्मन है ?
और एक बात अजीबो-ग़रीब
अलग होते हुए भी 
अंदर की दुनियां की 
बाहर की दुनियां से बात-चीत
मुसलसल करती रहती है 
खुद ही पीड़ित और खुद ही जज
फैसले ले लेती है
ये हक़ किसने दिया
खून जलाने  का ?
ये दो सगे भाई
बाहर की दुनियां और अंदर की दुनियां 
दोनों ग़ुलाम, एक ही राह पर चल रहे हैं 
लेकिन अंदर वाला ज़्यादा बुरा है 
जो जोड़-तोड़ में मसरूफ़ 
मुझे उसपे गुस्सा भी आता है 
फिर भी उसे पाल रहा हूँ 
मेरा नुक्सान हो रहा है
बताओ मैं क्या करूँ ?
 
 

Wednesday, August 19, 2015

हक़

हक़ 

कुदरत तूने जो किया, तेरा पूरा हक़ है 
मगर बन्दे सबको तेरी, सोच पे शक है 

तू जाग के भी सोता रहा रात-दिन 
अब वक़्त है सड़ती लाशों को गिन 
राहत की बातें खालिस बक-बक है 

शिवाले की मूर्ति ने जो नज़ारा देखा
क्या सही होगी इससे हाथों की रेखा 
जिनको दौलत मिली उनका लक है

खुदा के वास्ते कुदरत से न खेलो 
वो जो भी  देता  है प्रेम से ले लो 
"रत्ती" जो तेरी जेब में उतना तेरा हक़ है 

 

Tuesday, April 28, 2015

परिवार

परिवार 


उन लहरों का मचलना, मिलन करें किनारों से
ये ज़िन्दगी भी पनपती, खिलती है परिवारों से
 

इन रिवाज़ों के भवंर का, कुछ तो होता है असर 
दे सदा आबाद कुनबे, ऊँचे बड़े मीनारों से 
 

नाते-रिश्तों की ज़ंजीरें, मज़बूत हैं फौलाद सी 
महक उठती प्यार की, दिल के गलियारों से 
 

वक़्त की दुश्वारियां, लेती रहेंगी इम्तेहान
खानदान महफूज़ "रत्ती", बचाये गुनहगारों से 

Saturday, April 25, 2015

तीन घंटे का पर्चा

तीन घंटे का पर्चा 

चंद सांसों का खेल 
कुछ कल थीं, कुछ आज हैं, 
कुछ कल आयेंगी 
ये सांसें एक नज़राना हैं 
जिसका हम हर दिन लुत्फ़ उठा रहे हैं 
हर सुबह के साथ नयी 
दास्तां लिखते रहे
हयात की जानिब से 
काँटों को ढोने  के सिवा 
कुछ न हुआ हासिल 
आज कुछ लम्हों ने 
थोड़ी देर को हंसाया 
और दूजे पल एक सानिहा 
दर्द मुंह में दबाये आ धमका 
ग़मज़दा दर्दों की 
तिरछी नज़र के शिकार से 
ज़ख्म हरे भरे 
नासूर बनते रहे 
फिर इल्ज़ामात का सिलसिला 
हक़ीक़त कम और झूठ ज़ियादा 
इतना ही नहीं
नाउम्मीदी की दस्तक 
फिर सिफर को  रु-ब-रु पाया 
एकाएक खुदा याद आया
एक बशर की कीमत 
सिफर से भी कम आंकनेवाले
ज़माने के लोग, उनके अपने क़ायदे क़ानून 
इरादे, वायदे 
बेहद चौंकानेवाले, डरानेवाले 
एक अंदर की दुनियां 
उस दुनियां के अपने सपने 
और सपने कभी सबके साज़गार नहीं होते 
उनको साकार करने की कुव्वत नहीं 
और भूख की कमी है 
और ऐसे जीनेवालों का इलाज तो 
खुदा के पास भी नहीं 
ख़ैर  लुढ़कते, गिरते, चलते 
अश्क़, बहाते ,सुखाते 
दमे आखिर की दहलीज़ पर 
चार सू देखा 
अलविदा कहने के सिवा वक़्त ही कहाँ हैं
न सजदे में हाथ उठाये, न झुके 
जहाँ खड़े थे वहीँ टिके रहे
ये हयात का तीन घंटे का इम्तहान था 
जिसमे एक इंसान था 
जिसने अपने आवारा दिल की सुनके 
सिर्फ अपनी ज़िन्दगी जी 
तोषे का ख्याल न किया 
सरमाया बटोरते रहे 
खुशियाँ नहीं बांटी 
दर्दों को दावत दी 
इस खुली किताब में 
कुछ पन्ने सियाह हैं 
कुछ लहू से लिखे हैं 
खुद के खरीदे गुनाहों की फेहरिस्त लम्बी है 
उसका हिसाब-किताब, लेख-जोखा 
उसकी अदालत में होगा 
फिर एक दिन सांसों ने कहा 
इस जिस्म में घुटन होती है 
अब नहीं आयेंगे, हमें जाना होगा
उनके जाते ही परचा पूरा हो गया 
अधूरे खाब तकते रह गये 
सवाब और गुनाह बिना बताये 
रूह के साथ चल दिये…। 

Thursday, February 26, 2015

गीत न. ३

गीत न. ३
लहरों के सीने पे वो कुछ लिख आया
धुंधला था संदेसा कोई समझ न पाया
आहों की गली से सांसें गुज़रती हैं
हौले-हौले कदम आगे धरती हैं
अपने घर में जैसे कोई हो पराया
इन सुर्ख नज़रों से लहू न सूखे
पल हंसी के चुराये सपने भी लूटे
जी भर के कोसा और खूब रुलाया
अब गर्दिश में तारों की बदसुलूकी
बची थी जो इक आस वो भी टूटी
"रत्ती" खौफ-ज़दा रूह को तड़पाया

Wednesday, February 11, 2015

जीने की आदत

जीने की आदत
बिन पिये ही जीने की आदत बना ले
अपने रूठे-टूटे दिल को तू मना ले
मरकज़ मन्ज़िल का देख दिन-रात
उस बिखरी हुई सोच को जमा ले
 
ये ज़िन्दगी कश के सिवा कुछ और भी है
अगर उड़ाना है तो अपने ग़मों को उड़ा ले
 
उनको बर्बादियों के ताने-बाने बुनने दे
तू संगदिलों में अपनी जगह बना ले
 
बेशक हर बात का कुछ तो सबब होता है
जैसे हालात हों उनको वैसा सजा ले
 
 
कोई रात अंधेरों को मिटा नहीं सकती
पुकार सुबह के उजालों को बुला ले
 
पल-पल की खबर धड़कनों को बढ़ाये
उखड़ी हुई साँसों को गले लगा ले
 
कोई मुतमइन नज़र न आया जहाँ में
कोशिश से "रत्ती" मसलों पे निजात पा ले
 
शब्दार्थ
मरकज़ = केंद्र, संगदिल = पत्थर दिल,
सबब = कारण, मुतमइन = संतुष्ट

Tuesday, January 27, 2015

मन की आवाज़


मन की आवाज़
अच्छे सपनों को परवाज़ दीजिये
जो काम सोचा उसे पूरा कीजिये
कोई तुम्हारा नसीब नहीं बदल सकता
खुद कुआँ खोद के पानी पीजिये
ये शब के तारे कुछ पल ही चमकेंगे
ये अब्र भी थोड़ी देर को बरसेंगे
अपने हौसलों को ज़िंदा कीजिये
 
 
मुहोब्बत के साये में धोखा पाओगे
जो पास है तुम्हारे वो भी गवांओगे
घर से निकलो न इंतज़ार कीजिये
वफ़ा, जज़्बात की क़दर कोई न जाने
ज़माना ये ख़ल्क़त किसी की न माने
कभी "रत्ती" मन की भी सुन लीजिये