Thursday, January 19, 2017

गीत .  


इन झीलों के मुख पे लाली नहीं 
हुई ठंडक गुम हरियाली नहीं 


है रात पे पहरे जो खौफ भरे
सुब्ह के चेहरे लगे डरे-डरे 
दोपहर आंसुओं भरी खाली नहीं 


ये मौसम कटीले जाड़ों का 
और पत्थर सीना पहाड़ों का 
उजड़े चमन का कोई माली नहीं 


ढलती उम्र संग ढले नज़ारे 
आखिरी वक़्त कोई पुकारे 
"रत्ती" हम मुसाफिर सवाली नहीं 





Sunday, January 1, 2017

स्वागत २०१७

स्वागत २०१७ 


नन्हे-नन्हे पलों ने २०१६ सरकाया 
चुपके से साल २०१७ आया 


हर साल उम्मीदों भरा होता है 
इंसान कुछ पता है कुछ खोता है 
काल ने फिर पहिया घुमाया 
चुपके से साल २०१७ आया 


हरी-भरी चुनौतियां आयेंगी 
कभी हसायेंगी कभी रुलायेंगी 
कौन है इनसे बच पाया 


फर्श से अर्श छूने की चाह 
कदम बढ़ाते ही दिखेगी राह 
"रत्ती" हिम्मत से मिले सरमाया 


Tuesday, November 8, 2016

आर्थिक सर्जीकल स्ट्राइक

आर्थिक सर्जीकल स्ट्राइक 


कालेधन पे सर्जीकल स्ट्राइक 
कालाधन कैसे होगा वाइट 
पांच सौ हज़ार हुए बंद 
भ्रष्टाचारियों को किया अपंग 
देशद्रोहियों का उड़ा रंग
आतंकियों की कटी पतंग 
चुनावी माहौल हुआ बदरंग 
जाली नोटों को लगा जंग 
लोभियों का मोहभंग 
मोदी सरकार हुई दबंग 
ये ऐतिहासिक कदम है राइट 
इकोनॉमी की बढ़ेगी हाइट 

दूरगामी अच्छे परिणाम 
बड़ा साहसिक है ये काम 
चोरों का जीना हुआ हराम 
भारत का होगा जग में नाम 
जेन्युइन लोग बड़े एक्साइट 
"रत्ती" देश का फ्यूचर ब्राइट 


Wednesday, July 13, 2016

मेरा घर

मेरा घर 


कैसी-कैसी मसायलों वाला मेरा घर है।  
नये उजले दिल में इक खौफ है डर है।। 


लोग बगल में चिंगारी लिये फिरते हैं,
ऐसे शरीफ लोगों से घिरा मेरा घर है।  


दर्द-ए-दिल की परतें खोलूँ किसके सामने,
रूह पे बड़ा बोझ है, डरावना खंडहर है।  


प्यार का जवाब प्यार से नहीं मिलता, 
चार सू फैली इक, अजीब सी लहर है।


दमे आखिर तलक, देखे ग़मों के साये,
ये ज़िन्दगी 'रत्ती", काँटों भरी डगर है।     

Thursday, April 14, 2016

राम ही सर्वत्र है

राम ही सर्वत्र है               



राम इत राम उत
राम ही सर्वत्र है 
ये बात जान ले 
पल्ले बांध ले 
मान ले 


राम ही हर साँस में 
रोम-रोम में 
ध्यान कर ले 
ठान ले 


जग बिच घोर अँधेरा 
मन को टटोल 
अंतर पट खोल  
मान ले


संत की संगत में 
बहती प्रेम धरा 
धोवे पाप सारा 
ज्ञान ले

निज मन पे काबू 
"रत्ती" कर सीख 
न मांग भीख 
जान ले 




Wednesday, March 30, 2016

आरज़ू कहाँ जाये

आरज़ू कहाँ जाये


आरज़ू बन-ठन के निकली घर से                 
ठंडी हवाओं के लम्स ने
मदहोश किया 
कारवां रुकवा दिया 
रात रंगीनियों में जवां 
बिखरी हुई 
सुब्ह को मिलेंगे गर्म 
उबलते ताने-बने 
दिल झकझोरते अफ़साने 
उस चौराहे पे अंजान 
कड़कड़ाती धूप तले 
तलवे जलते रहे 
तपिश जिस्म में फैल गयी 
निढाल ज़िन्दगी तकती रह गयी 
जहाँ दिलासा भी गुमशुदा हो 
तो "रत्ती" आरज़ू कहाँ जाये .......

Friday, March 4, 2016

नासमझ


नासमझ             


कहने को मासूम हैं पत्थर फेंकते हैं ।  
अपनी ही नज़र से जहाँ को देखते हैं ।। 

अभी-अभी सुबह का आग़ाज़ हुआ है, 
आते ही नुक्ताचीनी नज़रें तरेरते हैं । 

जो भी काफिला चला शामिल हो लिये,
नासमझ मुल्क की धज्जियां उधेड़ते हैं।  

माजरा क्या, अफ़साना क्या मालूम नहीं, 
लोगों के जज़्बातों से रोज़ खेलते है।

हर शै के सौदागरों की कतार है लम्बी,
इज़्ज़त, शौहरत, मज़हब, इमां बेचते हैं।

सियासी जमातों के मतलब सब टेढ़े,
मौका मिलते ही रोटियां सेकते हैं। 

जवानों की क़ुर्बानियों का मान रखते, 
जो अपने सीने पे गोलियां झेलते हैं। 

अब तो खौफ़ के भी पर कुतर डाले,
हम बेबस "रत्ती" आस्मां को देखते हैं।