Wednesday, February 8, 2012

ग़ज़ल - ५

ग़ज़ल - ५



बोले न मुंह से लिखे माही किताब में

पहली दफा लिखा ख़त है मुझे जवाब में



जगमग हुआ है दिल कितने दिन के वास्ते

महका खिला ये गुल उजड़े से सराब में



वो ऐब को हुनर कहते हैं सही नहीं

मय लुत्फ़ दे मगर खुमारी शबाब में



नाशाद दिल किसी दिन टूटे यक़ीन हैं

तदबीर ढून्ढ लो इस पल तुम अज़ाब में



हैवान, तिशन-ए-खूं सियासत पसंद जो

फिर मुल्क लूटेंगे सब इस इन्तखाब में



रहमो-करम दुआ करना भूल सा गये

तहज़ीब की झलक मिले "रत्ती" अब ख़ाब में



२२१ / २१२१ / १२२१ / २१२

शब्दार्थ

शब्दार्थ


सराब = रेगिस्तान,  खुमारी = नशा,  शबाब = जवानी,

नाशाद = अप्रसन्न,  तदबीर = उपाय,  अज़ाब = परेशानी,

तिशन-ए-खूं = खून का प्यासा,  इन्तखाब = चुनाव,  तहज़ीब = संस्कार

Monday, December 12, 2011

उम्मीद (आशा)


दोस्तों एक आज़ाद नज़्म पेश कर रहा हूँ उम्मीद करता हूँ आपको पसंद आयेगी - सुरिन्दर रत्ती - मुंबई


उम्मीद (आशा)




उम्मीद पे दुनियां कायम

कयास लगाये, नज़रें टिकाये,

कभी चहके, कभी चिल्लाये

जुमलों को सजाये, जी को बहलाये

खुबसूरत बीमारी, सबकी तरफदारी

फिर आ धमकी बेकसी और बेक़रारी

थी तलाश नजूमी की, जो पढ़ता कसीदे

बताता लुभावने हसीं किस्से

देख रहा हूँ जिस्मो-जां के दो अलग हिस्से

जिगर तक्सीम कई टुकड़ों में,

फिर कहीं गूंजती भटकती सदा,

उसकी आहट, सुगबुगाहट, सनसनाहट

और इकलौती रूह जुम्बिश में

देखे दिन में तारे

खौफ़ से निकली चिंगारियां,

खाक़ में न मिले सदियों की यारियां

खुदा जानें क्या टूटा अंदर-बाहर

एक उम्मीद के सहारे निकले

किनारे-किनारे

बचा फक़त असर दुआओं का

दिलासा रहनुमाओं का

पीरों की सोहबत, उनका करम

यही उम्मीदों को बांधे रक्खे

अब तलक मिले थे चार सू धक्के

कोई कहता आबाद है, कोई कहे बरबाद है

मैं अन्जान हूँ

ख़ैर, उम्मीद का दामन पकड़ा है,

उसी के पहलू में रहना पसंद है.....

Saturday, October 1, 2011

ग़ज़ल - ४



ग़ज़ल - ४ 

पेच-ओ-ख़म  ना  ख़लिश  ना  ख़ार   होना   चाहिये  
बात है बस एक दिल में प्यार  होना  चाहिये

चांद ताकता आसमां से छुप के तेरी हर अदा,
है  निशानी इश्क़  की  इज़हार होना चाहिये

एक तरफा  प्यार बढती बेक़रारी क्या  देगी,
बारहा अब चाह बस गुफ़्तार  होना  चाहिये

चोट मारी है जिगर पे हमसफर ने ख़ाब  में,
रु - ब -रु नज़दीक से ही वार होना चाहिये 

जब  किसी  साये ने  छेड़ा  झट  से  बोली  रूह  भी,
फासला   तहज़ीब   का    सरकार   होना  चाहिये

इश्क़ सबको मज़ा दे गर प्यार सच्चा है किया,
प्यार में बस प्यार "रत्ती" प्यार होना चाहिये  

शब्दार्थ 
पेच-ओ-ख़म =घुमाव और मोड़,  ख़ार = कांटा
रु-ब-रु = सामने, बारहा = बार-बार, गुफ़्तार = बातचीत

Sunday, September 18, 2011

इल्म (Adult Education Programme)












इल्म
(Adult Education Programme)

कुछ दरीचे बंद थे, कैसे आये महकती सबा,
उम्र के इस दौर का, जोश बहोत अच्छा लगा

बढ गए उनके क़दम, कुछ सीखने की चाह में,
इल्म होगा कितना हासिल, वक़्त देगा इसका पता

कारवाँ गुज़र गया, ज़ोफ जिस्मो-जान में,
दमे आखिर कलम से, हो रही अब इब्तिदा

बेशुमार कलियाँ चमन में, तड़प रहीं, बेनूर भी,
ख़्वार होती जवानियाँ, पूछती सबसे जा-ब-जा

चंद सिक्कों की खनक में, हर इल्म कहीं खो गया,
अलिफ, बे ग़रीब न जाने, जीना उनका इक सज़ा

हों मुसलसल कोशिशें, गर तरक्क़ी के वास्ते,
क्या मजाल हुनर की, सर झुकाए रहे पास खड़ा

मोहताज, नाचार बशर, सोती रही हुकूमतें,
"रत्ती" विरासत में मिला, तंगहाल टूटा मदरसा

Tuesday, September 13, 2011

गीत - १

गीत - १  


समंदर यादों का भरा हुआ

हाय क्या हुआ ये क्या हुआ

क्या कुछ खो गया है

इक रोग हो गया है

खुबसूरत चेहरा डरा हुआ



जवां खाबों ने ली अंगडाइयां

लम्बी हैं बैरी तन्हाइयां

वक़्त भी है ठहरा हुआ

हाय क्या हुआ ये क्या हुआ .....



दर्द केह रहा ग़मों से अब

जिस्मो जां से जाओगे कब

इंतज़ार में ज़ख्म हरा हुआ

हाय क्या हुआ ये क्या हुआ .....



जाम की तरफ नज़र जाये

पी बहोत पर नशा न आये

मय है के पानी इसमें भरा हुआ

हाय क्या हुआ ये क्या हुआ .....



वस्ले यार की है बेक़रारी

लगी है दिल में चिंगारी

बुझाये ना बुझे बुरा हुआ

हाय क्या हुआ ये क्या हुआ .....

Friday, September 2, 2011

ग़ज़ल - ३

ग़ज़ल - ३

कीमत बहुत है एक सही कहे बयान की,
ये भी ज़रूर न फिसलन हो ज़बान की 

अम्बर से आये हैं सब महरूम टूटे दिल,
बेचैन, बिखरे, नाखुश, आहट तुफान  की 
 
सीरत अजीब शक्ल अजीबो ग़रीब है,
कैसे ज़हीन बात करे खानदान की 
 
शम्सो-क़मर नहीं चलते साथ ना कभी,
दीदार चाहे बात न कर इस जहान की
 
सर पर कफ़न लिये बढ़ता है जवान वो,
परवाह है नहीं दुश्मन की न जान की
 
तस्कीन दे रहे सब "रत्ती" ज़माने में,
बचे कुछ तो सूखे शजर दौलत किसान की

२२१ २१२१ १२२१ २१२ 

Friday, July 22, 2011

फक़त तुझे भुलाया

फक़त तुझे भुलाया 

चुन-चुन के तिनके, यहाँ तलक मैं आया,
उधार की ज़िन्दगी को, किसी तरह बचाया 

लाखों करम हैं मुझपे, उनका हिसाब नहीं हैं,
अगली सुब्ह फिर तेरी, चौखट पे मैं आया     

वादा खिलाफी तो मैं, हर रोज़ ही करता हूँ,
मुस्कूरा के नाचीज़ को, सीने से लगाया 

तू बाहें फैला के, इंतज़ार कर रहा है,
मेरी ही खता है, चेहरा अपना छुपाया

दुनियाँ का तो खौफ, तेरा ज़रा नहीं है,
तेरी हर बात नज़रअंदाज़ करता आया 

तेरे दम से ये आलम, महफूज़ चल रहा है,
ये हमारा ही कुसूर है, काँटों को बिछाया 

तेरे नाम की मय, बरस रही है जहां में,
अमृत छोड़ सबने, ज़हर का जाम उठाया 

कहीं भूले से कभी, सजदा भी करता हूँ,
दिल में बसी है दुनियां, तुझे बसा न पाया 

सारे आसरे सहारे, दम तोड़ रहे हैं, 
बुरे वक़्त में बस, खुदा ही याद आया 

हरेक राबता "रत्ती" ने, खूब है निभाया,
सबको याद रख के, फक़त तुझे भुलाया