Thursday, May 9, 2013

ग़ज़ल - १०

ग़ज़ल - १० 

लम्हे के गिरेबां से इक सांस चुरानी है 
इस वक़्त के चंगुल से जां सबको बचानी है 

कोई किस का दामन पकडे कब तक हर दिन 
हर दिल बिखरा टूटा सबको परेशानी है 

उनवान बदल जायेगा जीवन का तेरा 
परवाज़ सुबह की अच्छी शाम दिवानी है 

दो ख़ाब मिटे दस ने दी दस्तक हम को फिर 
कैसा रिश्ता इनका कितनी मनमानी है 

जुमले अब अंगारे की शक्ल में बरसे हैं 
जलते-बुझते दिल आँखों से गिरे पानी है 

नस-नस कहती करे-दुश्वार है शफ़क़त 
मोहब्बत में  हर शै अब रोज़ लुटानी है 

अब रंग लहू का कैसे लाल से नीला हो 
ना मुमकिन को मुमकिन शै कह के बतानी है 

"रत्ती" न हिमायत कर ना खुशफ़हमी ले आ 
हालत दिल की नाज़ुक राह भी तुफानी है 

शब्दार्थ 
करे-दुश्वार - कठिन काम 
शफ़क़त - स्नेह 

अहमक़

अहमक़ 

क्या सोचता है तू 
दूसरों के किरदार के बारे में 
धोखेबाज़ हैं,  खुदगरज़ हैं वो 
खुदसिताई में जीने वाले 
कभी भूले से ही 
अपने गिरेबां को देख ले 
तो मालूम होगा तुझे 
सरे आलम में 
तू सबसे बड़ा अहमक़ है .....

Tuesday, February 19, 2013

कशमकश

कशमकश
 
ये ज़ालिम बेकसी क़दम खींचती है
 
न जाने कहाँ से नये घर ढूंढती है
 
मेरा बस चले तो दूर ही रहूँ उम्रभर
 
दिलोदिमाग पे छाई पहरेदार घूमती है   
 
 
रफ्ता-रफ्ता वक़्त ने कसे हैं शिकंजे
 
ग़मो से घिरा आदमी भला कैसे हँसे
 
रह-रह के अब तो सांस भी फूलती है
 
 
ज़माने ने भी चुनी अपनी सोची डगर
 
काम करने से पहले करे वो अगर-मगर
 
कशमकश में ज़िन्दगी नहीं झूमती है
 
 
 
जलती हुई शम्मा के बुझने से पहले
 
टूटे-फूटे जुमलों में दुनियां से कह ले
 
"रत्ती" छीनो न आज़ादी रूह झूलती है
 
 

Tuesday, February 12, 2013

नज़दीकियाँ

नज़दीकियाँ
 
दूरियों से नहीं साहेब, नजदीकियों से डर लगता है
अपने दिल के तहखाने में, वो मेरे राज़ रखता है
 
सियासी चालों की आग, हरदम सुलगती रहती है
मैं अनजान क्या जानूं, ये सब वो क्यूँ करता है
 
राम की बातें करने वाले, रावण के पक्के दोस्त,
दूसरों को दुःख देकर, उनको सुख मिलता है
 
प्यार, वफ़ा, तहज़ीब से, कुछ लेना देना नहीं
मुहोब्बत के दावे अक्सर, वो रोज़ ही करता है
 
रु-ब-रु लगता है जैसे, अज़ीम हो शख्सीयत
वार खंजर का पीठ में, बड़े जोर से करता है
 
आसमान सर पे उठाने की, हिमाकत करना आदत
हमारा सूरज पूरब से, उनका पश्चिम से निकलता है
 
सौ खून करने हैं मुझे, आज दिन भर में,
"रत्ती" ये क़सम खा के, वो घर से निकलता है

Friday, January 18, 2013

"पडोसी"


दोस्तों, भारत पाक सीमा पर जो  हो रहा है, वो बड़ा ही दुखद है, हमारे जवानों के सर को कलम कर दिया गया,

इस बात से हर हिंदुस्तानी के दिल को चोट लगी है, एक छोटी सी रचना पेश कर रहा हूँ शीर्षक है "पडोसी"

"पडोसी"

 

मेरे शहर की गावों से अब नहीं बनती

बिलावजह जाने क्यूँ भोहें हैं तनती

 

गली-गली में अमन की बात करते हैं,

फिर अचानक तलवारें हवाओं में चमकी

 

मुल्कों, मजहबों, जातियों में बटे दिल,

दो सगे भाइयों में भी अब नहीं बनती

 

फिर लहू बहेगा ज़मीं पे बेगुनाहों का,

सरहद पार से रही है रोज़ धमकी   

 

सर कलम करके क्या होगा हासिल,

डर ख़ुदा का खौफ़ किये जाओ मन की

 

पडोसी नज़रें तरेरता बेलगाम हुआ,

पल में तोला, पल मैं माशा, बड़ा है सनकी

 

हुक्मरां, ख़ामोश, तमाशबीं बन बैठे,

अवाम बेज़ार ख़ुदा लाज रखे वतन की

 

जानवरों से भी बदतर बशर का चलन,

"रत्ती" फ़िक्र हयात की और तन की

Monday, January 14, 2013

गीत - 4

गीत - 4
साये पूछते हैं हमें रात में
क्या खता हुई थी मुलाकात में
रुसवाई की मैं सोच नहीं सकता
आपका हाथ थामा है हाथ में
साये पूछते हैं हमें रात में,,,,,
गुलाबी रुत की बेरुखी और ताने
बोलो कहाँ जाये अब तेरे दिवाने
सबा भी जैसे मुंह फेरती हो
ज़रा मज़ा नहीं इस बरसात में
साये पूछते हैं हमें रात में,,,,,
उन दीवारों के कान बड़े पतले
दिल मचले तो भला कैसे मचले
पानी भी जो फूंक के पीना पड़े
इक बेकसी बची है हयात में
साये पूछते हैं हमें रात में,,,,,
हर लम्हे की अजब कहानी
रु-ब-रु होती रहती हैरानी
दिल न बहलायेंगे ऐसे मंज़र
ग़म दस्तक दे इन हालात में
साये पूछते हैं हमें रात में,,,,,

Thursday, January 3, 2013

गीत - 3

गीत - 3

आँखों से दिखता नहीं, बाहर का उजाला 
अंदर की दुनियां का, खेल है निराला 

सपने भी पलते यहाँ, अरमान तड़पते हैं 
आहें कराहती हैं, और दर्द भी हंसते हैं
गला निगलता नहीं, मुंह का निवाला    
आँखों से दिखता नहीं, बाहर का उजाला .....

नये-नये ज़ख्म मिले, लिपटे रहे जान से
आशियाँ ये ताउम्र का, रहो इसमे शान से
ऐसे में याद आ गया, वो पर्वत का शिवाला     
आँखों से दिखता नहीं, बाहर का उजाला .....

टूटे के बिखरा तन, डर के ले अंगडाईयां 
रात में आ गयी, मेरे हिस्से तन्हाइयां  
ये सुबह तीरगी भरी, चेहरा इसका काला 
आँखों से दिखता नहीं, बाहर का उजाला .....


Monday, December 24, 2012

ग़ज़ल - 9
जो देना है मुझे सजा कर दे I
अपने हाथों से पास सब धर दे    I 1 I
 
वो जफ़ा ही करे वफ़ा करके I
प्यार तौले बखील कमतर दे    I 2 I
 
बारहा टूटता है दिल क्यूँ कर I
रोज़ कोई न कोई ठोकर दे    I 3 I
 
हूँ गुनहगार मैं के तुम जानाँ I
प्यार के बदले हाय खंजर दे    I 4 I
 
आँख में धूल झोंकना आसां I
सिलसिलेवार दुख सितमगर दे    I 5 I
 
ख़ुदकुशी न कर ले तेरे ग़म में I
आ अभी मिल गले ख़ुशी भर दे   I 6 I
 
महफिलें सज गयी ग़ज़ल की फिर I
दाद पे दाद सब सुखनवर दे    I 7 I
 
मुनफरिद राह प्यार की "रत्ती" I
जंग-ए-इश्क़ दर्द न भर दे    I 8 I