Saturday, April 25, 2015

तीन घंटे का पर्चा

तीन घंटे का पर्चा 

चंद सांसों का खेल 
कुछ कल थीं, कुछ आज हैं, 
कुछ कल आयेंगी 
ये सांसें एक नज़राना हैं 
जिसका हम हर दिन लुत्फ़ उठा रहे हैं 
हर सुबह के साथ नयी 
दास्तां लिखते रहे
हयात की जानिब से 
काँटों को ढोने  के सिवा 
कुछ न हुआ हासिल 
आज कुछ लम्हों ने 
थोड़ी देर को हंसाया 
और दूजे पल एक सानिहा 
दर्द मुंह में दबाये आ धमका 
ग़मज़दा दर्दों की 
तिरछी नज़र के शिकार से 
ज़ख्म हरे भरे 
नासूर बनते रहे 
फिर इल्ज़ामात का सिलसिला 
हक़ीक़त कम और झूठ ज़ियादा 
इतना ही नहीं
नाउम्मीदी की दस्तक 
फिर सिफर को  रु-ब-रु पाया 
एकाएक खुदा याद आया
एक बशर की कीमत 
सिफर से भी कम आंकनेवाले
ज़माने के लोग, उनके अपने क़ायदे क़ानून 
इरादे, वायदे 
बेहद चौंकानेवाले, डरानेवाले 
एक अंदर की दुनियां 
उस दुनियां के अपने सपने 
और सपने कभी सबके साज़गार नहीं होते 
उनको साकार करने की कुव्वत नहीं 
और भूख की कमी है 
और ऐसे जीनेवालों का इलाज तो 
खुदा के पास भी नहीं 
ख़ैर  लुढ़कते, गिरते, चलते 
अश्क़, बहाते ,सुखाते 
दमे आखिर की दहलीज़ पर 
चार सू देखा 
अलविदा कहने के सिवा वक़्त ही कहाँ हैं
न सजदे में हाथ उठाये, न झुके 
जहाँ खड़े थे वहीँ टिके रहे
ये हयात का तीन घंटे का इम्तहान था 
जिसमे एक इंसान था 
जिसने अपने आवारा दिल की सुनके 
सिर्फ अपनी ज़िन्दगी जी 
तोषे का ख्याल न किया 
सरमाया बटोरते रहे 
खुशियाँ नहीं बांटी 
दर्दों को दावत दी 
इस खुली किताब में 
कुछ पन्ने सियाह हैं 
कुछ लहू से लिखे हैं 
खुद के खरीदे गुनाहों की फेहरिस्त लम्बी है 
उसका हिसाब-किताब, लेख-जोखा 
उसकी अदालत में होगा 
फिर एक दिन सांसों ने कहा 
इस जिस्म में घुटन होती है 
अब नहीं आयेंगे, हमें जाना होगा
उनके जाते ही परचा पूरा हो गया 
अधूरे खाब तकते रह गये 
सवाब और गुनाह बिना बताये 
रूह के साथ चल दिये…। 

Thursday, February 26, 2015

गीत न. ३

गीत न. ३
लहरों के सीने पे वो कुछ लिख आया
धुंधला था संदेसा कोई समझ न पाया
आहों की गली से सांसें गुज़रती हैं
हौले-हौले कदम आगे धरती हैं
अपने घर में जैसे कोई हो पराया
इन सुर्ख नज़रों से लहू न सूखे
पल हंसी के चुराये सपने भी लूटे
जी भर के कोसा और खूब रुलाया
अब गर्दिश में तारों की बदसुलूकी
बची थी जो इक आस वो भी टूटी
"रत्ती" खौफ-ज़दा रूह को तड़पाया

Wednesday, February 11, 2015

जीने की आदत

जीने की आदत
बिन पिये ही जीने की आदत बना ले
अपने रूठे-टूटे दिल को तू मना ले
मरकज़ मन्ज़िल का देख दिन-रात
उस बिखरी हुई सोच को जमा ले
 
ये ज़िन्दगी कश के सिवा कुछ और भी है
अगर उड़ाना है तो अपने ग़मों को उड़ा ले
 
उनको बर्बादियों के ताने-बाने बुनने दे
तू संगदिलों में अपनी जगह बना ले
 
बेशक हर बात का कुछ तो सबब होता है
जैसे हालात हों उनको वैसा सजा ले
 
 
कोई रात अंधेरों को मिटा नहीं सकती
पुकार सुबह के उजालों को बुला ले
 
पल-पल की खबर धड़कनों को बढ़ाये
उखड़ी हुई साँसों को गले लगा ले
 
कोई मुतमइन नज़र न आया जहाँ में
कोशिश से "रत्ती" मसलों पे निजात पा ले
 
शब्दार्थ
मरकज़ = केंद्र, संगदिल = पत्थर दिल,
सबब = कारण, मुतमइन = संतुष्ट

Tuesday, January 27, 2015

मन की आवाज़


मन की आवाज़
अच्छे सपनों को परवाज़ दीजिये
जो काम सोचा उसे पूरा कीजिये
कोई तुम्हारा नसीब नहीं बदल सकता
खुद कुआँ खोद के पानी पीजिये
ये शब के तारे कुछ पल ही चमकेंगे
ये अब्र भी थोड़ी देर को बरसेंगे
अपने हौसलों को ज़िंदा कीजिये
 
 
मुहोब्बत के साये में धोखा पाओगे
जो पास है तुम्हारे वो भी गवांओगे
घर से निकलो न इंतज़ार कीजिये
वफ़ा, जज़्बात की क़दर कोई न जाने
ज़माना ये ख़ल्क़त किसी की न माने
कभी "रत्ती" मन की भी सुन लीजिये
  

Thursday, January 22, 2015

सियासी लीडर

सियासी लीडर
 
क्या लीडर सच्चा होता है, अपनी अवाम का ।
या फिर भूखा दौलत का, नहीं किसी काम का ।। 
 
 
नक़ाब-पे-नक़ाब ओढ़ के, निकले अपने घर से,
बखूबी रोल अदा करे वो, शातिर बेईमान का ।
 
 
उनकी सियासी चालों से, हम तो नहीं वाक़िफ़,
खामोशियों में था इशारा, लोगों के क़त्लेआम का ।
 
 
 
मेरे ज़हन में बसी हैं, कई उलझनें उलझी,
मुझे भरोसा अपने खुदा, वाहेगुरु, प्यारे राम का । 
 
 
 
माना के सियासत में तो, सब होता है जायज़,
हर तबके की हिफाज़त, भरोसा दो जान का ।
 
 
ज़िन्दगी मुड़-मुड़ के "रत्ती", ले इम्तिहां हमारा,
क्या कोई दर बचा है, मोहब्बत का, ईमान का ।

Monday, January 19, 2015

अच्छे दिन

अच्छे दिन
अच्छे दिनों के सपने सब देखते हैं
अभी कल ही नेताजी ने कुछ सपने दिखाये
विकास दर गगन को छुआ दी
उन्नती की गाड़ी खड़ी है कहीं गैराज में
उसके टायरों में से
आशा की हवा भी निकल दी
बुरे दिनों ने काला चोला पहन के
अच्छे दिनों को अगवा कर लिया है
जीवन को तहस-नहस करके दबा दिया है
अश्रुओं की नमकीन धारा बढ़ायी
महंगाई, भ्रष्टाचार बड़े ठग
निकले बड़े आततायी
एक शीशा कहीं कोने में खड़ा
दिखा रहा है चहरे की रंगत
जवानी में झुर्रियां हैं या झुर्रियों में जवानी
नशे का शिकार युवा,
बेसुध क्या जाने - अच्छे दिन
अच्छे दिन किसी मदारी के बन्दर हैं
मनचाहा नाच नचाओ
हिचकोले खाते हुए कमर मटकाओ
मदारी के पास बढ़िया चाबुक है
बन्दर की पीठ पे जब-तब जड़ता है
गले में फाँस है बेचारा
दर्द से कहराता है, दांत भींच के डरता है
संसद में सफेद पोशों की भीड़ ने
पैंसठ सालों से बेहिसाब
सारा माल-टाल खाया
दाद देनी पड़ेगी, एक भी डकार न आया
भाई मेरे,
अच्छे दिन तो नेताओं के आये
भारतवासी बाबाजी का ठुल्लू पाये
अच्छे दिन अख़बारों में,
मिडिया में देखे सुने
सच तो ये है अच्छे दिन लोगों के
ज़हन में रहते हैं, रहेंगे, सारी उमर
अपराधी बन कर
काश के अच्छे दिनों के बीज मिलते
खेती करके उपजे दानों को
सारे विश्व में बांटता .....
 

Thursday, December 25, 2014

कटी पतंग

कटी पतंग
बचपन पतंगों की बहार सा
लाड, प्यार, दुलार सा
हुड़दंग, शरारत, मस्ती
नन्हे होंठों पे मुस्कान हस्ती
कौन आया कौन गया
क्या खाया क्या पकाया
क्या टुटा क्या फूटा
न चोट का डर, न दर्द की खबर
फिर आया
जवानी का अनोखा व्यव्हार
बात-बात पे गुस्सा प्रतिकार
खिलने लगे तन के बंध
रोज़ तू-तू मैं-मैं होती जंग
सजगता में भी थे मदहोश
जवानी में गुम था होश
चारों और संघर्ष के मेले
हमने भी खूब खेल खेले
किसी को लूटा, किसी को डुबाया
उसके रोने पे बड़ा मज़ा आया
फिर दस्तक दी
वक़्त का पहिया ले आया
चिरपरिचित अंदाज़ में बुढ़ापे से मिलाया
मैंने अनुभवों से कुछ सीखा था
वही बार-बार दोहराया
जीवन नैया डगमगाती रुकी किनारे
वहां अतीत के फूल थे, भविष्य के अंगारे
पग धरूँ तो किस जगह
सब कहते तुम नहीं हो हमारे
कटी पतंग क्या करे
नहीं उड़ने की क्षमता
भिक्षा मांगने की मेरी नहीं मंशा
मैं तार-तार कटी पतंग सही
बस स्वतंत्रता चाहूँ
प्रारभ्ध की हवा जहाँ ले चले वही जाऊं
आओ, आओ निकट आओ
टूटी डोर बची है ले जाओ …
टूटी डोर बची है ले जाओ …