दर्पण
Tuesday, August 18, 2009
नेक दिल
नेक दिल
वो शमां जली के न जली,
पर रात ढली
अन्धेरों में सिमटी,
यादों की गली
मैंने लाख मनाया उसे,
मेरी एक न चली
ज़ुबां तल्ख़ तो कभी,
मिसरी की डली
जैसी भी है "रत्ती"
वो नेकदिल भली
1 टिप्पणियाँ:
ओम आर्य
Aug 19, 2009 07:08 AM
बहुत ही खुबसूरत ........एक छोटी पर बहुत कुछ बयान कर गयी ......आभार
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