Tuesday, January 5, 2010

दहर

दहर

राह-ए-दहर में   बातों के,  फसानें थे बहोत 
काली  रातों  में दिल में, अफ़साने  थे  बहोत   

मेरी   मौजूदगी  में जो,  कतराते   रहते थे,
जाने  के   बाद  होठों  पे,  तराने  थे    बहोत 

हम  ही अकेले  न  थे,  जो उनपे  मरते थे,
गली-गली,  गाँव-गाँव,  अनजाने  थे बहोत

रात दिन  घंटों उसका, इंतज़ार  करते  रहते,
उसकी इक  झलक पाने के, दिवाने थे बहोत 


उनसे  रब्त क़रीब का,  हैं  वो  दिल के  पास,
रूठे   एक   दिन  ऐसे  जैसे,  बेगाने  थे  बहोत 

हर लम्हा ज़ीस्त  का “रत्ती“, इम्तहान  सा लगे,
नसीब   को  नये   खेल,   आज़माने  थे   बहोत 

शब्दार्थ
राह-ए-दहर = जीवन की राह, रब्त = रिश्ता