Wednesday, January 20, 2010

अहवाले बशर

अहवाले बशर



ये   नुक्स-ए-आबो-हवा  देखी  ज़माने में,
सदियां लग जाती लोगों को समझाने में


ये दौर-ए-गर्दिश है, इम्तहां लेता सबका, 
हर शख्स   मसरूफ नसीबा चमकाने में 


यहां जुर्म को बेरोकटोक रक्स करते देखा,
इंसाफ  को   शर्म   आयी  रू- ब- रू आने में 


कम लिबास में हूरें उड़ती हैं इन फ़ज़ाओं में,
नग्नता गली - गली में भलाई मुंह छिपाने में


अफ़साना - ए - फुरक़त   न   दोहराओ  तुम, 
बहोत मज़ा आता उनको  सितम   ढाने  में


माज़ी की खता से माकूल कदम उठाये न, 
तजुर्बा    रायगां   हयात  के    शामियाने  में


"रत्ती" अहवाले बशर न पूछो तुम हमसे,
उलझा रहता रात-दिन दौलत कमाने में


शब्दार्थ
नुक्स-ए-आबो-हवा = दूषित जलवायु
मसरूफ = व्यस्त, रक्स = नृत्य
अफ़साना-ए-फुरक़त = विरह की कहानी
माज़ी = गुज़रा हुआ समय, माकूल = उचित,

रायगां = व्यर्थ, हयात = जीवन
अहवाले बशर = मानव का हाल