बुरा न मानो होली है
ये होली भी क्या होली है
चेहरे सब लाचार से
रोनक तो गुम हो गयी
लोग लगें बीमार से
ज़हरीले रंगों से भैया
अंगों को बहुत ख़तरा
बेचनेवाले मुनाफा चाहें
न मौत खरीदें बाज़ार से
इस होली में प्रेम नहीं है
छुपी नागिन वासना
जोर-ज़बरदस्ती से त्रस्त सब
और अटपटे व्यवहार से
नकली मावे की मिठाई से
मुंह मीठा न कराओ
रंग में भंग न हो जाये
गुड खिला दो प्यार से
मीठे शब्दों की चाशनी से
चीनी का स्वाद ले लो
सरकारी कड़वी नीतियों से घायल
दुखी महंगाई की मार से
होली के रंग चमकते रहते
महंगाई अगर न होती
भोली जनता बड़ी ख़फ़ा
निकम्मी सरकार से
राधा मोहन की होली देखो
श्रद्धा प्रेम की खुशबू आवे
ग्वाल-बाल, रसिक भक्त
विभोर अमृत की बौछार से
और कुछ दे नहीं सकते
शुभकामना स्वीकार लें
"रत्ती" भर संतोष सही
न गिला करो अपने यार से
17 टिप्पणियाँ: