Wednesday, June 3, 2009

दिनचर्या

दिनचर्या
चिड़ियों की चूँ-चूँ ने आभास कराया, भोर हो गयी है। भास्कर आँगन में आ गया है, अरे आज फिर देर हो गयी जैसे-तैसे स्नान करके तैयार हो जलपान ग्रहण किया और सड़क पर सरपट दौड़ लगायी, बस पकड़नें की। हाँफते-हाँफते जान गले में अटक गयी किसी तरह दफ्तर पहुंचा । चपरासी ने बताया, सेक्शन बहुत गरम है, साहब के कमरे से चिल्लानें की आवाज़ आ रही थी, गुस्से से लाल-पीले हो रहे थे, बेल बजी तो जैसे डर सतानें लगा साहब मेरे क़रीब आ पहुँचे, तो रामलाल, ये है तुम्हारे आने का समय, वो...वो... सर जी कुछ मेहमान घर में आये हैं सो थोड़ी देर हो गयी । हर आदमी बहानें बनानें में निपुण है। हर दिन एक नया बहाना। साहब ने वही अपना घिसा-पीटा भाषण दिया और जाते-जाते कह गये आज की तुम्हारी तनख्वाह काट ली जायेगी और अपने केबिन में चले गये। हे भगवान! आज का दिन भी बेकार हो गया । मैं रोज़ ही सोचता हूँ , सुबह जल्दी उठ कर दफ्तर जाऊँगा लेकिन परिस्थितीयों का गुलाम, मानव रात को एक बजे से पहले नहीं सोता, तो सुबह क्या ख़ाक जल्दी उठेगा वो ख़ैर, जैसे-तैसे दिन बीता, घर पहुँचा और फिर टीवी देखा, गाने सुनें, अख़बार के पन्नों में झाँकना शुरू किया भोजन खाया गप-गप-गप, फिर पड़ोसी ने खिड़की से आवाज़ लगायी रामलाल आ जाओ, मानों मन माँगी मुराद मिल गयी हो आज पत्ते तुम पीसो, पत्ते खेलते-खेलते रात के दो बज गये अरे, बहुत रात हो गयी, सुबह फिर काम पर जाना है। शुभ रात्री। सुबह फिर पक्षीयों और भास्कर ने दस्तक दी, देर से उठा और भाग-दौड़ शुरू कर दी, ये दिनचर्या बन गयी है हमारी। ज़िन्दगी एक ऐसे साँचे में ढली है, जिसका कोई आकार नहीं, टेढी-मेढी ज़िन्दगी, पग-पग पर नोंक-झोंक, अभी बहुत से कार्य अनछुए और अधूरे हैं और ज़िन्दगी तितर-बितर, ताश के बावन पत्तों में उल्झी हुई, मानव गुलाम अपनी ख़राब आदतों का और दोष भगवान और दुसरों को फिर कहता है शायद मेरे भाग्य में यही लिखा है।