
Monday, July 27, 2009
दूरियाँ

Sunday, July 19, 2009
एक सच
क्षण में जनम हो रहा
और विलय भी हो रहा
आस-निरास पर टिका
ये जीवन भी रो रहा
आम के बदले तू धरा में
क्यों बबूल बो रहा
पीड़ा से भरे मन को
आंसुओं से धो रहा
कुंभकरण की भांति मनुष्य
है आज भी सो रहा
बहुमूल्य सभ्यता,प्रथा,
संस्कृति भी खो रहा .....
कब तलक

कब तलक
यादों के सहारे बैठे रहेंगे कब तलक,
आंखें थक गयी खुले न मेरी पलक
मेहरबां तुम्हें याद नहीं अपने वादे,
सपनों में ही सही दिखा दो एक झलक
एक चान्द को दिल में बसाया था मैंने,
वो चान्द जा बैठा बहोत दूर फलक
जो जाम आंखों से पिलाये वो थे रसीले,
"रत्ती" आज पीला दो मेरा सूखा है हलक
Saturday, July 18, 2009
हिंसा
हिंसा
वफ़ा-जफ़ा की बातें दोहरायी गयी,
नज़रें लाल सुर्ख फिर लड़ायी गयी
क़यामत को बुलाने का इरादा है उनका,
जिस्मों पे ज़ोर से तलवार लहरायी गयी
वो क्या जानें लहू बेशकीमती है,
बहा दी नदियाँ साँसें रूकवायी गयी
लाशों की सेज पे चले हंस्ते हुए,
गली-गली खुशीयाँ मनायी गयी
कटे जिस्म के टुकड़े पूछते हैं सबसे,
क्यों नफ़रत की आग लगायी गयी
किसका गुनाह कितना बड़ा मालूम नहीं,
बस तश्दुद्द कू-ब-कू फैलायी गयी
ज़मीं के बाशिंदों ने सीखा अब तलक,
एक मज़हब की दिवार बनायी गयी
कहीं छोड़ आये प्यारे हबीब रहम को,
बड़े पीरों की संगत भी ठुकरायी गयी
हादिसों से दिल की दिवारें काँपती हैं "रत्ती",
मगर किसी की जां न बचायी गयी