मौज-दर-मौज
इस वक्त की तल्खीयों का
बोझ सबके शानों पर है
ऐसे लम्हात में इम्तहाँ से
रोज रू-ब-रू होना पडता है
दरीचे दिल के जो, खोलोगे तो पाओगे
छोटे-छोटे रोज़न नहीं इसमें
बड़े-बड़े दर हैं
यहाँ से तो दर्दों के काफ़िले गुज़र सकते हैं
इस मंज़र की पैकर
लोगों के ज़हन में ऐसी उतरी है
बाक़ी बची ज़िंदगी में ख़ौफ के साये
हमारे पीछे दौड़ेंगे
जैसे गली के कुत्ते
अजनबीयों पर टूट पड़ते हैं
डरा-डरा सहमा हुआ आदमी
अपने जिस्मो-जां को
किसी तरह संभालता है
ये हर रोज़ की हिकारत
ख़ुद-ब-ख़ुद पेश आती रहती है
मौज-दर-मौज सबके सामने .....
Friday, June 18, 2010
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12 टिप्पणियाँ:
....बेहतरीन!!!
bahut badiy prastuti
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nice post, i think u must try this website to increase traffic. have a nice day !!!
बढिया रचना, बधाई।
sundar atisundar
बडिया प्रस्तुति बधाई
सुन्दर रचना है बधाई\
सचमुच वहाँ तो दर्दों के काफिले गुजर सकते हैं ...और खौफ के साए आदमी के पीछे उसी तरह दौड़ रहे हैं , इनसे बचने के लिए आदमी जितनी तेज दौड़ता है ये भी उतनी तेज आदमी के पीछे दौड़ते हैं ।
bahut badiya
very good.
bahut khoob! dard saaf jhalaktaa hai apki rachnaa se. dil ki baat dil tak gayi.
--Gaurav
Good work !!
aisi hi rachanye publish karte rahiye...
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