Friday, June 18, 2010

मौज-दर-मौज

मौज-दर-मौज

इस वक्त की तल्खीयों का
बोझ सबके शानों पर है
ऐसे लम्हात में इम्तहाँ से 
रोज रू-ब-रू होना पडता है
दरीचे दिल के जो, खोलोगे तो पाओगे
छोटे-छोटे रोज़न नहीं इसमें
बड़े-बड़े दर हैं
यहाँ से तो दर्दों के काफ़िले गुज़र सकते हैं 
इस मंज़र की पैकर 
लोगों के ज़हन में ऐसी उतरी है
बाक़ी बची ज़िंदगी में ख़ौफ के साये 
हमारे पीछे दौड़ेंगे
जैसे गली के कुत्ते
अजनबीयों पर टूट पड़ते हैं 
डरा-डरा सहमा हुआ आदमी
अपने जिस्मो-जां को
किसी तरह संभालता है
ये हर रोज़ की हिकारत 
ख़ुद-ब-ख़ुद पेश आती रहती है
मौज-दर-मौज सबके सामने .....

12 टिप्पणियाँ:

'उदय' said...

....बेहतरीन!!!

संजय कुमार चौरसिया said...

bahut badiy prastuti

http://sanjaykuamr.blogspot.com/

Maria Mcclain said...

nice post, i think u must try this website to increase traffic. have a nice day !!!

ajit gupta said...

बढिया रचना, बधाई।

Sunil Kumar said...

sundar atisundar

निर्मला कपिला said...

बडिया प्रस्तुति बधाई

परमजीत सिँह बाली said...

सुन्दर रचना है बधाई\

शारदा अरोरा said...

सचमुच वहाँ तो दर्दों के काफिले गुजर सकते हैं ...और खौफ के साए आदमी के पीछे उसी तरह दौड़ रहे हैं , इनसे बचने के लिए आदमी जितनी तेज दौड़ता है ये भी उतनी तेज आदमी के पीछे दौड़ते हैं ।

manjeet said...

bahut badiya

mridula pradhan said...

very good.

Gaurav Sharma said...

bahut khoob! dard saaf jhalaktaa hai apki rachnaa se. dil ki baat dil tak gayi.

--Gaurav

sms in hindi said...

Good work !!
aisi hi rachanye publish karte rahiye...

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