Monday, May 19, 2008

प्रेरणा

प्रेरणा तुम न होती तो, मेरा अस्तित्व न होता
मैं किसी आम आदमी की तरह रह रहा होता
मेरे दिल में जो सपन्दन होती है,
बुद्धि का विकास होता है,
नये-नये विचार उत्पन्न होते हैं,
मुझे ऊर्जा मिलती है,
तो एक नयी रचना जन्म लेती है.
लोग शायद तुम से परिचित न हों
लेकिन तुम मेरी कल्पना को उत्तेजित कर,
मुझे लिखनें पर मजबुर कर देती हो
राह चलते-चलते कुछ शब्द अगर,
मेरी बुद्धि में घर कर गये
तो मैं विचलित हो जाता हूं,
जब तक पुरा न कर लूं उसे।

प्रेरणा तुम मेरे लिये एक बीज हो,
जिसे मैं बोता हूँ यादों की भूमि में
और मेहनत से कलम का हल चलाता हूँ
शब्दों का खाद-पानी डाल कर,

एक नयी रचना, नन्हें पौधे का, सपना सजाता हूँ
लो, देखो, प्रेरणा अब बड़ी हो गयी है,

विशाल वृक्ष का रुप धर लिया है
मई, सुंदर, शब्दों के फूलों को,
मैंने चुन लिया
रचना भी एक मीठा फल है,
जिसे देख मेरे मुंह में पानी भर आया
"रत्ती" मैं ये मीठा आम, मेरी रचना,
जो कभी प्रेरणा थी,
सबके साथ बाँट कर खाना चाहता हूँ .....